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Showing posts from January, 2021

दो ग़ज़ल एक ही बहर में..

    1..ग़ज़ल 💐 पूरी कितनी होती है मन की बात कुछ ही पूरी होती है मन की बात झूठी-झूठी बातें करने वालों के झूठी-झूठी होती है मन की बात हम तो बस उसकी सुनते हैं जिसके विद्वानों सी होती है मन की बात !! मयकशों की महफ़िलों में सुनते हैं जी ख़ूब नशीली होती है मन की बात !! अंगूरों सी काया जिसकी, उसके तो बस अंगूरी होती है मन की बात !! गीत ग़ज़ल अफ़सानों में कुछ होती है सच और कुछ ख़्याली होती है मन की बात !! दिन में कैसी होती है पर रातों में बहकी-बहकी होती है मन की बात मिल जाते हैं आपस में जब दो मन मन से मन की होती है मन की बात उसकी तो न ख़त्म 'जेहद' होगी, जिसके सागर जैसी होती है मन की बात !! ****************************     2..ग़ज़ल 💐 देखो अब क्या होती है मन की बात हँसती है या रोती है मन की बात !! जन-जन तक जाती है या फिर यारो मन ही मन में खोती है मन की बात ख़ुश करती है कितनों को और कितनों को कितनी सूई चुभोती है मन की बात !! कितने ही फिसल जाते हैं इसपे तो कितनी चिकनी होती है मन की बात कुछ का कोई मोल नहीं लेकिन कुछ हीरे जैसी होती है मन की बात !! दुनिया की बात अगर चे सागर है तो फिर उसकी सोत...

ख़ुश्बू-ख़ुश्बू पवन से आती है..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 ख़ुश्बू-ख़ुश्बू पवन से आती है गुलबदन किस चमन से आती है जिस्म धरती का जब सुलगता है तब ये बारिश गगन से आती है ! रूह रौशन हो जिसकी, उसके तो रौशनी सी बदन से आती है !! मयकदे की ये सारी सर-मस्ती मुझको उनके नयन से आती है याद आती हैं कितनी ही बातें जब कोई शय वतन से आती है क्या खिलेगा वफ़ाओं का गुलशन ये खिलन तो मिलन से आती है ! प्यार ही प्यार हो 'जेहद' जिसमें प्रीत उसके सुख़न से आती है !     ~ जावेद जेहद

बाहर में जो दिल बहलाए..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बाहर में जो दिल बहलाए घर में वो ख़ुद ही आग लगाए अपनों को जो भी ठुकराए ग़ैरों की वो ठोकर खाए !! धन के नशे में न इतराए कौन भला जग को समझाए हर दामन पे दाग़ है मैला सोच के कोई उंगली उठाए ज़ुल्म-ओ-सितम का, जौर-ओ-जफ़ा का दुनिया कब तक बोझ उठाए !! उनकी याद बहुत आती है सावन की रुत जब-जब आए लोग तरक़्क़ी कर गए लेकिन दिल में वही है हाए-हाए !! अपनी-अपनी सबको पड़ी है कौन किसे ख़ातिर में लाए !! झूठा वादा करते-करते क्या से क्या है वो बन जाए मिट गई लाज 'जेहद' जी देखो दुल्हन भी अब न शर्माए !!      ~ जावेद जहद

आज का डूबा कल निकले गा..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 आज का डूबा कल निकले गा सूरज फिर से चल निकले गा होगी फिर से मिल्लत हम में नफ़रत का फिर बल निकले गा आज उसे फिर देखा गुमसुम दिल का दर्द उबल निकले गा मेरा सीना चीर के देखो दिल ये गाते ग़ज़ल निकले गा कुछ नदी में कीचड़ रहने दो इसमें ही तो कँवल निकले गा पौधा जो भी धूप न झेले पेड़ वो कैसे सबल निकले गा चोरी करके, रिशवत देके क्या होगा जो फल निकले गा झूठे वादे करता है जो उसका प्यार तो छल निकले गा एक अकेले दम से कैसे दुनिया भर का हल निकले गा बुरा-बुरा जब काम हो, कैसे अच्छा कोई फल निकले गा ये ज़बाँ हमेशा फिसली 'जेहद' अब क्या ख़ाक सँभल निकले गा     ~ जावेद जहद

शाम-ओ-सहर,रोज़-ओ-शब चाहा..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 शाम-ओ-सहर, रोज़-ओ-शब चाहा कम इससे तुझको कब चाहा !! हद से ज़्यादा, ख़ुद से बढ़ के तेरा ही नाम-ओ-नसब चाहा कोई ग़ुल न किया न शोर किया चुपके से तुझे ब-अदब चाहा !! तूने तो चाहा कोई ग़रज़ से और मैंने तुझे बे-सबब चाहा हर वक़्त ही तेरी ख़्वाहिश की हर वक़्त ही ऐश-ओ-तरब चाहा कब से जो मुझपे मरता रहा मैंने उसे जाके अब चाहा !! दो-दो चेहरा रखने वाला क्या यार भी मैंने अजब चाहा सारे हुनर को छोड़ 'जेहद' जी मैंने तो बस ये अदब चाहा !!    ~ जावेद जहद

अब तो ऐसे पिघल गया सूरज..

      ताज़ा ग़ज़ल अब तो ऐसे पिघल गया सूरज जैसे हर फ़न का ढल गया सूरज आग ऐसी लगी ज़माने में उसके शोलों में जल गया सूरज चाँद कोई नदी में उतरा था देखते ही मचल गया सूरज चाँद और तारे खो गए खुद में जो फ़लक से निकल गया सूरज देख कर रौशनी नई जग में ग़ार में बैठा जल गया सूरज ! दाग़ तो दुनिया पर ही कम न थे अपने रुख़ पर भी मल गया सूरज शह्र की रात यूँ दमकती है जैसे खम्भों में फल गया सूरज इतना ग़ुब्बार फैला है कि 'जहद' उसका कोहरा निगल गया सूरज      ~ जावेद जहद

दो ग़ज़ल छोटी बहर में..

      1..ग़ज़ल 💐 सब आजकल बस छल है छल ये ज़िंदगी अच्छी थी कल हर मस्अला कब होगा हल हिम्मत है गर अब सब बदल आसान कर कर पग सरल सपनों से तू अब मत बहल दर्द-ओ-अलम से अब निकल सब मर गए मर तू भी चल छोटी बहर अच्छी ग़ज़ल बोले 'जहद' अब तो सँभल *********** 2..ग़ज़ल 💐 फ़तह मेरी कभी उसकी है सारी ही ख़ुशी वक़्ती लदे हैं फल झुकी टहनी हसीं बातें हैं सब उनकी सियासत है वही बिगड़ी परेशानी वही अब की ये दुनिया है ग़ज़ब रब की 'जहद' मुश्किल बहर छोटी !!  ~ जावेद जहद

उनके रुख़ पे ज़ुल्फ़ों का ऐसे है लहराए बादल..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 उनके रुख़ पे ज़ुल्फ़ों का ऐसे है लहराए बादल पर्वत की चोटी पर जैसे उमड़-उमड़ के छाए बादल प्यार का सावन क्या होता है, क्या होती है प्रेम अगन वो क्या जाने, जिसके दिल का दिल से न टकराए बादल उनकी वफ़ा पे कर तो लिया है मैंने भरोसा ऐ यारो डर है लेकिन उनके दिल पे जफ़ा का न छा जाए बादल सुंदर तो है चाँद बहुत लेकिन उसकी सुंदरता को छुपा-छुपा के, दिखा-दिखा के और भी है बढ़ाए बादल सावन लाए भादो भी ये, सोना बरसाए चाँदी भी और यही सैलाब कहीं, हरियाली कहीं पर लाए बादल ऐ प्रेम-पवन, अब तो तू ही ज़ोर-ज़ोर से चलती जा मुमकिन है तेरे चलते ही नफ़रत का छट जाए बादल तेरी अदाएं देख के मुझको ऐसा लगता है कि 'जहद' लहरा के, बलखा के जैसे बिजली है बरसाए बादल !        ~ जावेद जहद

अपनी ही इस क़दर तू न बस देख-भाल कर..

            ताज़ा  ग़ज़ल 💐 अपनी ही इस क़दर तू न बस देख-भाल कर औरों की भी ख़ुशी का तो फ़िक्र-ओ-ख़्याल कर जाती है गर तो जाए ख़ुशी न मलाल कर मिलता है ग़म जो रख ले उसी को सँभाल कर थोड़े में ख़ुश हो और तू कम में कमाल कर बच-बच के एक-एक क़दम इस्तेमाल कर ! नफ़रत से कोई आए तो तू रौंद दे उसे उलफ़त करे तो दे-दे कलेजा निकाल कर कुछ भी न मिल सके तुझे इंकार के सिवा न भूल से भी ऐसा किसी से सवाल कर ! जश्न-ए-बहार को भी तू कर दे कभी उदास और तू कभी ख़िज़ाँ में मुसर्रत बहाल कर ! शोहरत जो चाहिए तुझे दौलत लुटा 'जहद' अब कुछ न मिल सकेगा चवन्नी उछाल कर          ~ जावेद जहद

रह-रह के आज मुझको पानी सरक रहा है..

        ताज़ा ग़ज़ल रह-रह के आज मुझको पानी सरक रहा है मुझको वो याद करके शायद सिसक रहा है कोई ख़ुशी नहीं है, हाँ ग़म ज़रूर है जी जब ही तो ये क़फ़स का पंछी चहक रहा है यारब मिरा वो सपना हो जाता सच कभी तो देखा था जिसमें सारा गुलशन चहक रहा है दुनिया की शक्ल-ओ-सूरत चमके तो कैसे यारो अंधी डगर में जब ये आलम भटक रहा है !! यूँ हावी हो गया है शैतान इस जहाँ पर हर-हर क़दम पे अब तो इंसांं बहक रहा है माँ-बाप हों या बच्चे, महबूब हो या साथी कोई किसी के शामिल याँ कब तलक रहा है गुमनाम मैं कभी था, लेकिन 'जहद' ये अब तो कितना सुख़न में अपना चेहरा चमक रहा है !         ~ जावेद जहद

वादा वफ़ा का तोड़ के जब वो गुज़र गया..

          ताज़ा ग़ज़ल वादा वफ़ा का तोड़ के जब वो गुज़र गया ऐसा लगा कि सीने में ख़ंजर उतर गया !! उसके सितम की बात न मुझसे जी पूछिए मेरे वुजूद पर से समंदर गुज़र गया !! उनको गले लगा के, मोहब्बत में खाके चोट दिल लुट गया मगर ये मुक़द्दर सँवर गया !! उनको जुदाई में तो ख़ुदा जाने क्या हुआ मेरे जिगर से दर्द का लश्कर गुज़र गया ! अब चाहता हूँ फिर वही ठोकर लगे मुझे अब सोचता हूँ हाए वो पत्थर किधर गया माना कि साहिलों पे तो ख़तरा नहीं कोई पर क्या करोगे तुम जो समंदर बिफर गया दुनिया को स्वर्ग जैसा बनाने के फेर में क्या-क्या बिगड़ गया यहाँ, क्या-क्या सँवर गया बढ़ती उमर के साथ 'जहद' फ़िक्र यूँ बढ़ी इस दिल से मस्तियों का नशा ही उतर गया         ~ जावेद जहद

सारा गुलशन ही बिखर जाए बहुत मुमकिन है..

       ताज़ा ग़ज़ल सारा गुलशन ही बिखर जाए बहुत मुमकिन है ऐसा तूफ़ान ये कर जाए बहुत मुमकिन है !! देख कर तेरी घनी ज़ुल्फ़ का ये साया घना कोई दीवाना ठहर जाए बहुत मुमकिन है ! फिर नज़र आई वो बिजली सी गिराती बुलबुल फिर कोई इश्क़ में मर जाए बहुत मुमकिन है ! इस क़दर ख़ौफ़ का आलम है कि अब तो कोई अपने ही साए से डर जाए बहुत मुमकिन है !! ज़ह्र-आलूद फ़ज़ाओं का बशर अब यारो एक ठोकर में ही मर जाए बहुत मुमकिन है घर की बदहाली से फिर कोई परेशां होकर आज फिर दूर शहर जाए बहुत मुमकिन है देखते-देखते ये ज़ुल्म-ओ-सितम दिल मेरा इस भरी दुनिया से भर जाए बहुत मुमकिन है ऐसे हालात में तेवर ही बदल ले ये 'जेहद' और ग़ज़ल आग से भर जाए बहुत मुमकिन है       ~ जावेद जहद

ज़ुल्म के पत्थर बरस रहे हैं सर के हमारे पास मुसलसल..

          ताज़ा ग़ज़ल ज़ुल्म के पत्थर बरस रहे हैं सर के हमारे पास मुसलसल और हम बैठे देख रहे हैं बेहिस, बे-हस्सास मुसलसल !! आग लगी है मेरे मन में कैसी अब के ये मत पूछो चारों तरफ़ है जलता सहरा और मिरी ये प्यास मुसलसल आया करती थीं ख़ुश्बूएं दुनिया को महकाने जहाँ से आती है अब उसी जगह से जुर्म-ओ-गुनह की बास मुसलसल सोज़-ओ-ग़म से, दर्द-ओ-अलम से नम हैं निगाहें कबसे हमारी और उधर मस्ती की महफ़िल, ख़ुशियों के इजलास मुसलसल मेरे घर भी ख़ुशियों की बरसात करेंगे इक दिन खुल के मुझको ख़ुदाया, ख़ुशहालों से कैसी है ये आस मुसलसल जितना उनको भुलाना चाहा, वो और भी याद मुझे आए 'जहद' उनके ग़म का तंहाई में बढ़ता गया एहसास मुसलसल !!          ~ जावेद जहद

ये चाँद तो बेशक मेरा है..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 ये चाँद तो बेशक मेरा है मुझमें ही इसका डेरा है ये चाँद सा रुख़, नीली आँखें क्या रूप सुहाना तेरा है !! ये रात नुरानी है जानम या तेरे बदन का फेरा है कोई यूँ ही नहीं ग़ज़ल कहता मौसम ने मुझे आ घेरा है !! ग़ज़लें हैं मेरा घर-आंगन ग़ज़लों में मेरा बसेरा है ! इश्क़ में तेरे, नाम तुम्हारा किस शय पे न हमने उकेरा है जी भर के हमें तुम मिलने दो चले जाना, अभी तो सवेरा है  मुझको काहे का ख़ौफ़ 'जहद' मन मेरा तो ये सपेरा है !!     ~ जावेद जहद

मैं रांझा वो अब मिरी हीर नहीं..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 मैं रांझा वो अब मिरी हीर नहीं आँखों में कोई तस्वीर नहीं !! तन उनसे मिला, मन उनसे मिला पर उनसे मिली तक़दीर नहीं !! मैं जो चाहूँ ख़्यालों में लाऊँ ख़्यालों पर मिरे ज़ंजीर नहीं न जाने किधर ये जाए जहाँ इस जहाँ का अब कोई मीर नहीं ये दिल ये जिगर सब उनका हुआ अब अपनी कोई जागीर नहीं !! हम उनको तो सर पे बिठाते हैं वो बदलते मगर तक़दीर नहीं ! अब चारों तरफ़ वो होने लगा जिसकी तो हसीं तस्वीर नहीं ऐ दुनिया को दुख देने वाले बहता है तिरा क्यों नीर नहीं इस फ़न में अकेला है एक 'जेहद' कोई पैदा भी होगा 'मीर' नहीं !!     ~ जावेद जहद

ये बम धमाकों का मंज़र बहुत भयानक है..

      ताज़ा ग़ज़ल ये बम धमाकों का मंज़र बहुत भयानक है लहू-लहू का  समंदर बहुत भयानक है !! उड़ाई जैसे है जिस्मों की धज्जियां बम से कहा ये जाए  सितमगर बहुत भयानक है ये हादसात, फ़सादात, रोज़ की मौतें कि अब तो ज़िंदगी यकसर बहुत भयानक है ये ख़ूनी चेहरे, ये शैतानी हरकतों वाले कि इनका काम तो हर-हर बहुत भयानक है उदासी फैली है चारों तरफ़ ही अब ऐसे कि लगता सबका ही घर-घर बहुत भयानक है कोई कहे तो कहे तुझको क़ौम का रहबर मैं ये कहूँ तिरा लश्कर बहुत भयानक है ! कहीं से देखो तो दिलकश दिखाई देता है कहीं पे धरती का मंज़र बहुत भयानक है ये नफ़रतें, ये अदावत, ये क़त्ल-ओ-ग़ारत का सभी के वास्ते ख़ंजर बहुत भयानक है !! किसी को जैसे किसी से कोई ग़रज़ ही नहीं किसी का देखो तो चक्कर बहुत भयानक है वो जो भी ख़ून की नदियां बहाता है नाहक़ वो वाक़ई में सितमगर बहुत भयानक है !! कोई हमेशा हसीं ख़्वाब देखता है 'जहद' किसी ने देखा ये अक्सर बहुत भयानक है       ~ जावेद जहद

उलफ़त का फूल अब सही से खिल नहीं रहा..

          #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 उलफ़त का फूल अब सही से खिल नहीं रहा पूरी तरह से दिल किसी का  मिल नहीं  रहा वो दौर भी तो अब मुझे  हासिल नहीं रहा ये दौर भी तो अब मिरे  क़ाबिल नहीं रहा हर शख़्स है परेशाँ ज़माने में आज कल ये अपनी भूल का तो सिला मिल नहीं रहा शर्म-ओ-हया, मोहब्बत-ओ-ईसार-ओ-आबरू किस-किस का ये जहान भी क़ातिल नहीं रहा दंगा-फ़साद, झगड़ा, लड़ाई व छल-कपट इनमें बताओ कौन है शामिल नहीं रहा ? दुनिया की हर ख़ुशी को मिटाने चला था जो दुनिया में अब तो लो वही क़ातिल नहीं रहा इल्म-ओ-हुनर, ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत की जोत से किस दौर में जहान ये झिलमिल नहीं रहा ? बेताबी, बेक़रारी,  तड़प, दर्द के सिवा हाँ और कुछ तो इश्क़ में हासिल नहीं रहा मानेगा कौन ये जो बता दे भी दिल अगर किसको भुलाया, किस से ये ग़ाफ़िल नहीं रहा हर शय यहाँ से होके गुज़र जाती है कहीं कोई भी चीज़ का यहाँ साहिल नहीं रहा मश्क़-ए-सुख़न है इतना किया मैंने तो 'जहद' मुश्किल सुख़न भी अब मुझे मुश्किल नहीं रहा        #जावेद_जहद

चाँद हो तुम तो मेरी बला से..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 चाँद हो तुम तो मेरी बला से  कम नहीं मैं भी मस्त घटा से सुर्ख़ हो तुम जो हुस्न-ओ-अदा से सब्ज़ हूँ मैं भी इश्क़-ओ-वफ़ा से डरते हो क्यों तुम काली घटा से मेरी पनाह में ठंडी हवा से !! आओ चलो तारों में चलें हम इश्क़ को अपने सजाने ज़या से तेरा बदन जो छू कर गुज़रे ख़ूब लगे वो हवा तो सबा से इश्क़ की दुनिया अब न रही वो पूछ लो अपनी-अपनी वफ़ा से मरना है फिर तो 'जहद' क्या डरना ज़ुल्म-ओ-सितम से, जौर-ओ-जफ़ा से        ~ जावेद जहद

प्यार से आया करो, प्यार से जाया करो..

       #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 प्यार से आया करो, प्यार से जाया करो बेरुख़ी का ये सितम मुझपे न ढाया करो इन हसीं होंठों से तुम फूल बरसाया करो तल्ख़ और तीखे कभी गीत न गाया करो आ तिरे जलवों पे मैं वार दूँ ख़ुद को सनम और तुम मुझपे भी अब हुस्न का साया करो मेरी गुस्ताख़ी पे तुम करके शर्मिंदा मुझे अपनी बेबाकी पे ये यूँ न मुस्काया करो प्यार करने का मज़ा सिर्फ़ तंहाई में है साथ अपने न किसी और को लाया करो ये ग़ज़ल मेरी 'जहद' नाम अब तेरे हुई तुम इसे देखा करो, तुम इसे गाया करो       #जावेद_जहद

मेरे घर से तो बहुत दूर नगर है उसका..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 मेरे घर से तो बहुत दूर नगर है उसका फिर भी हर वक़्त मिरे पास बसर है उसका क्या हुआ, दिल को अगर छीन लिया है उसने मेरे भी क़बज़े में तो यारो जिगर है उसका !! मैं इधर होके भी अब जैसे उधर रहता हूँ वो उधर को है मगर ध्यान इधर है उसका अपनी ये राह जुदा हो गई तो क्या ग़म है कल तलक था जो वही अब भी सफ़र है उसका वो अजब शख़्स है, न जाने उसे क्या ग़म है एक मुद्दत से ही दिल उजड़ा शहर है उसका मेरे अश्आर में जो प्यार उमड़ आता है ये तो मेरा नहीं, सच मानो असर है उसका ये जो अफ़साना 'जहद' जिसने भी तहरीर किया इसमें वो है तो नहीं, क़िस्सा मगर है उसका !!        ~ जावेद जहद

मोहब्बत भरे दिल की चाहत करो..

         #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मोहब्बत भरे दिल की चाहत करो मोहब्बत मिले तो मोहब्बत करो ! चराग़-ए-मोहब्बत है बुझने लगा सभी मिलके इसकी हिफ़ाज़त करो बिखर जाएगा एकता का जहाँ कि झगड़े की तुम न हिमाक़त करो बहुत दाग़ से भर ली पेशानियाँ कि अब तो सही से हुकूमत करो ख़ुदा जो भी नेमत नवाज़े तुम्हें वो औरों को भी तुम इनायत करो हाँ इससे बड़ी कोई नेकी नहीं मुसीबत के मारों की ख़िदमत करो ज़माना है सारा बिखरने लगा कि अब बंद भी क़त्ल-ओ-ग़ारत करो लो ये क्या कि कोई निहारे भी ना खुलेआम और तुम क़यामत करो लो ये क्या तुम्हें कोई टोके भी ना खुलेआम और तुम क़यामत करो कहीं कोई इसको बनाए भी ना कहीं तुम पटाख़े तिजारत करो बहुत प्यारी तहज़ीब अपनी है ये 'जहद' तुम इसे न मलामत करो     #जावेद_जहद

इश्क़ दिल की ज़बान होता है..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 इश्क़ दिल की ज़बान होता है ये नज़र से बयान होता है !! इश्क़ की आग जब भड़कती है हर नज़ारा जवान होता है !! इश्क़ को कुछ नज़र नहीं आता हुस्न जब मेहरबान होता है !! इश्क़ में कैसे ख़्वाब आते हैं और क्या-क्या गुमान होता है इश्क़ जो हर किसी से करता है वो बड़ा ही महान होता है !! क्यों ज़माना है इश्क़ का दुश्मन इश्क़ तो सबकी जान होता है !! क्या खिलेगा 'जहद' वो फूलों सा ख़ाक जिसका जहान होता है !!       ~ जावेद जहद

सहते-सहते दर्द-ए-दिल तो इक ज़माना हो गया..

          ताज़ा ग़ज़ल सहते-सहते दर्द-ए-दिल तो इक ज़माना हो गया लगता है अब ग़म ही अपना आशियाना हो गया शाम तक ये दिल सुबह से मुस्कुराता ही रहा होते ही शब जाने क्यों गुम मुस्कुराना हो गया पहले तो ये इश्क़ अपना, अपने तक ही था मगर रफ़्ता-रफ़्ता क़िस्सा ये भी आलमाना हो गया !! उनके जाने का तो कोई रास्ता छोड़ा न था एक खिड़की थी खुली, बस ये बहाना हो गया दुनिया ने हर वक़्त इसको इतना ज़्यादा दुख दिया सीधा-साधा, भोला-भाला दिल सयाना हो गया !! हाए बे-फ़िक्री थी कितनी मेरे अंदर कल तलक कैसे लेकिन दिल मिरा भी शायराना हो गया !! जाने कब से ख़ुद को शायर हम बनाते ही रहे आख़िर अपना रूप भी अब शायराना हो गया बे-वज़न हम हो गए या वक़्त हम पे आ चढ़ा कैसा अपना भी 'जहद' रुतबा निशाना हो गया       ~ जावेद जहद

बस मेरी मोहब्बत में तुम ख़ूब सँवर जाना..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 बस मेरी मोहब्बत में  तुम ख़ूब सँवर जाना इस दिल में उतर जाना, इस जान में भर जाना पहलू में तुम्हारे मैं  आकर जो सिमट जाऊं बाँहों में मिरी तुम भी फूलों सा बिखर जाना दो फूल से गालों पे  लब कैसे मचलते हैं तुम पास जो आए तो लब ने ये हुनर जाना अब तुमसे बिछड़ के तो अच्छा है तड़पने से इस ज़ुल्फ़ के साए में रहते हुए मर जाना !! जब प्यार किया है तो  हम प्यार निभाएंगे सब कहते हैं ये जानम, तुम काम ये कर जाना ये दर भी तुम्हारा है, वो घर भी तुम्हारा है जो मन को तिरे भाए, ऐ जान उधर जाना मैं राह-ए-मोहब्बत का इक अंधा मुसाफ़िर हूँ इसको ही 'जहद' मैंने बस अपना सफ़र जाना         ~ जावेद जहद 

बोल तेरी जफ़ाकशी को कैसे दिल में छुपाया जाए..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 बोल तेरी जफ़ाकशी को कैसे दिल में छुपाया जाए दर्द भरे इस गीत को गाया जाए या भुलाया जाए ? बर्बाद मोहब्बत का मिलके आओ जश्न मनाया जाए बूंद-बूंद आँखों से आंसू टपका के मुस्काया जाए !! तुम भी छोड़ो घर अपना और मैं भी छोड़ूँ अपना दर दुनिया से फिर दूर कहीं इक अपना घर बसाया जाए  तुम रूप धार लो जोगन का, मैं भेष बदल लूँ जोगी का पर्वत-पर्वत, जंगल-जंगल मस्ती में लहराया जाए !! तू भी मीत विवादों का और मैं भी यार फ़सादों का आ अपनी-अपनी हस्ती पे अब ख़ुद इलज़ाम लगाया जाए लड़ते-लड़ते इंसानों ने कैसा जहाँ को कर डाला अब तो 'जहद' इस जग को और जहन्नम न बनाया जाए         ~ जावेद जहद

ज़ुल्म का फैला हुआ शग़्ल है चारों तरफ़..

       ताज़ा ग़ज़ल ज़ुल्म का फैला हुआ शग़्ल है चारों तरफ़ दर्द में  डूबी हुई  शक्ल है चारों तरफ़ !! अब कोई फ़न-आर्ट हो या कोई तकनीक हो दनदनाती फिर रही नक़्ल है चारों तरफ़ !! नफ़रतें दिल में लिए अब गले मिलते हैं लोग अस्ल में अब नाम का वस्ल है चारों तरफ़ !! ये जहाँ आज़ाद है  अब तो सारा ही मगर हर किसी का कुछ न कुछ दख़्ल है चारों तरफ़ नफ़रतों की आग में सिर्फ़ जलती ही नहीं गोली से भी भुन रही नस्ल है चारों तरफ़ उलझनों का जाल अब इस तरह है बिछ चुका उलझनों में क़ैद सी अक़्ल है चारों तरफ़ !! अब तो सारी दुनिया की आज के माहौल में एक जैसी ही 'जहद' शक्ल है चारों तरफ़ !!        ~ जावेद जहद

फ़िक्र दिल में है नज़र काग़ज़ पर..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 फ़िक्र दिल में है नज़र काग़ज़ पर कुछ तो आएगा उभर काग़ज़ पर फूल भेजा है उधर प्यार भरा प्यार आएगा इधर काग़ज़ पर हम हैं दीवाने क़लम, काग़ज़ के हम दिखाते हैं हुनर काग़ज़ पर क्या ज़रूरत हमें है लड़ने की फ़ैसला करलें अगर काग़ज़ पर इल्म के जितने भी थे मुझको मिले रख दिए लाल-ओ-गुहर काग़ज़ पर ये मिरे शेर नहीं हैं यारो हैं मिरे दिल्लो-जिगर काग़ज़ पर दिल में इक बार उठी ऐसी लहर बन गया दिल का भँवर काग़ज़ पर कुछ कहीं हो तो नज़र आता है जा-ब-जा उसका असर काग़ज़ पर हम कहीं और रहें या न रहें हम रहेंगे ही अमर काग़ज़ पर चाँद और तारे, चमन, गीत, ग़ज़ल सब किए उनकी नज़र काग़ज़ पर कुछ ग़ज़ल होने से रह जाती है कुछ तो आती है सँवर काग़ज़ पर भेज दो मुझको कहीं बस यूँ ही मत करो शह्र-बदर काग़ज़ पर हम भी जंगी हैं 'जहद' मानते हैं हम तो लड़ते हैं मगर काग़ज़ पर      ~ जावेद जहद

सागर मिला कहीं पे तो साग़र कहीं मिला..

        ताज़ा ग़ज़ल सागर मिला कहीं पे तो साग़र कहीं मिला मुझको थी प्यास जिसकी कहीं वो नहीं मिला आता नहीं पसंद नज़र को किसी का रूप मुझको क़सम से यार ही ऐसा हसीं मिला वो पा गया हमारी तो सारी ही चाहतें जब भी ख़ुलूस से मुझे कोई कहीं मिला देता है धमकी और भगाता भी है नहीं मुझको न जाने कैसा ये मेरा मकीं मिला तब उसकी और भी मुझे यादें सता गईंं जब उसके जैसा ही मुझे कोई हसीं मिला पूरी तरह से किसको मिला है यहाँ 'जहद' जिसको मिला है चैन तो ज़ेर-ए-ज़मीं मिला       ~ जावेद जहद

जो थी तिरे बदन में वो ख़ुश्बू कहीं नहीं..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 जो थी तिरे बदन में वो ख़ुश्बू कहीं नहीं ग़ुंचों में, गुल, कली में किसी सू कहीं नहीं तेरी नज़र के बाद मिरे दिल पे आज तक डाला किसी नज़र ने भी जादू कहीं नहीं इस दिल को नर्म छांव सा देता था जो क़रार मेरे लिए वो साया-ए-गेसू कहीं नहीं !! इक तेरे ग़म के बाद किसी ग़म में आजतक सावन की तर्ह बरसे ये आंसू कहीं नहीं !! जी चाहता है सांसों को मिलती रहे यूँ ही तेरे मिलन की ख़ुश्बू सी ख़ुश्बू कहीं नहीं यूँ तो हैं बेशुमार ही दुनिया में लज़्ज़तें पर लुत्फ़ जितना तेरे है पहलू कहीं नहीं इस दिल में बस तुम्हारी सनम यादें रह गईंं इसके अलावा साथ मिरे तू कहीं नहीं !! वो आँखें जिनमें साफ़ चमकते थे कल 'जहद' उन में वफ़ा के अब तो वो जुगनू कहीं नहीं !!       ~ जावेद जहद

सुना है तेरा लोगों में बड़ा ही नाम है साक़ी..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 सुना है तेरा लोगों में बड़ा ही नाम है साक़ी ज़रा सा हम भी तो देखें तिरा क्या जाम है साक़ी तिरी आँखों से पीते ही ये दिल ग़म भूल जाता है कि तेरे जाम में सचमुच बड़ा आराम है साक़ी किसी का होश लेकर और ख़ुद को होश में रखना जहाँ होता है दिल को शक यही वो गाम है साक़ी नज़र का जाम हम दोनों तो मिलके साथ पीते हैं हमीं पे किस लिए फिर हिर्स का इलज़ाम है साक़ी नशे में देखिए रहने लगा सारा जहाँ डूबा यहाँ हम मय-नशीनों का भी अब क्या काम है साक़ी कहीं भी दिल नहीं लगता है जबसे उनसे बिछड़े हैं अगर कुछ है सुकूँ तो तेरे ज़ेर-ए-बाम है साक़ी तुम्हारे मयकदे की सारी रौनक़ है 'जहद' हम से जहाँ बैठे तो हो जाती सुबह से शाम है साक़ी !!        ~ जावेद जहद

जब तलक साथ रहा ख़ूब रहा..

        #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 जब तलक साथ रहा ख़ूब रहा फिर कहीं दूर ही महबूब रहा  जाने क्यों दर्द-ए-जिगर देने को मेरा ही दिल उसे मतलूब रहा क्या पता कब वो समाया दिल में कब नज़र मिलते ही मैं डूब रहा दूर तक तन्हा कभी राहों में यूँ ही चलना भी बहुत ख़ूब रहा जब कभी याद वो आया तो मिरा ग़म में दिल देर तलक डूब रहा उसकी नज़रों में सभी प्यारे थे अपना किरदार ही मायूब रहा हर तरह के ही ग़ज़ल में अपनी रंग भरना भी बहुत ख़ूब रहा कुछ है चीज़ों में नई दिलचस्पी और कुछ चीज़ों से दिल ऊब रहा जितना है शेर-ओ-सुख़न आज मुझे इतना तो पहले न मरग़ूब रहा कुछ ग़ज़ल ऐसी कहो लोग कहें ये हुनर तुमसे भी मंसूब रहा कुछ न आता था 'जहद' पर ये ग़ज़ल ख़ूब कहना भी बहुत ख़ूब रहा !!      ~ जावेद जहद

स्वच्छ फ़िज़ा सिंगार बिना..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 स्वच्छ फ़िज़ा सिंगार बिना बाग़ खिले न बहार बिना ! आँख हो नीली या काली फीकी लगे है ख़ुमार बिना प्यार ही प्यार है कैसा प्यार प्यार है क्या तकरार बिना लाख हुनर हो हाथों में होगा क्या औज़ार बिना किसको मिला है सुख-सागर दुख की नदी किए पार बिना उसकी नाव तो डूबे गी बह गया जो पतवार बिना बेजा है ये सब गुलपोशी उनकी वफ़ा के हार बिना प्यार से वो क्या समझेगा सुधरे नहीं जो मार बिना कुछ भी नहीं इंसान 'जहद' प्यार, वफ़ा, ईसार बिना !!    ~ जावेद जहद

चाँद, तारों की चाह की जाए..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 चाँद, तारों की चाह की जाए ख़ुशनज़ारों की चाह की जाए ख़ुशनसीबों पे जान क्या देना ग़म के मारों की चाह की जाए फूंक दी जाए कुछ नमी दिल की कुछ शरारों की चाह की जाए !! आग-शोलों के रेगज़ारों में आबशारों की चाह की जाए बा-सहारों का साथ क्या देना बे-सहारों की चाह की जाए ! तब ख़िज़ाँ को भी ध्यान में रक्खें जब बहारों की चाह की जाए !! दुश्मन-ए-जाँ से फेर कर आँखें जाँ-निसारों की चाह की जाए ! भाई-चारे की हो या उलफ़त की शुद्ध धारों की चाह की जाए !! चंद लोगों का दोस्ताना क्या सौ-हज़ारों की चाह की जाए हद से बढ़ जाए बेक़रारी जब तब क़रारों की चाह की जाए छोड़ कर अब तो सारा हंगामा बस इशारों की चाह की जाए शेर-गोई में अब 'जहद' आओ नव-विचारों की चाह की जाए      ~ जावेद जहद

न लड़ाई न मार करने की..

     ताज़ा ग़ज़ल न लड़ाई न मार करने की चीज़ हो तुम तो प्यार करने की न डरो ग़म के तुम थपेड़ों से ये नदी तो है पार करने की कुछ हैं चीज़ें सहेजने वाली और कुछ हैं निसार करने की मौसम-ए-ग़म ही सीख देता है ज़िंदगी ख़ुशगवार करने की थक गए कुछ तो कुछ ने ठानी है दश्त-ओ-सहरा बहार करने की घुट गया दम ही क्या ज़रूरत थी वार पे और वार करने की ? कुछ को धुन है 'जहद' हमेशा ही बस यूँ ही ख़लफ़िशार करने की      ~ जावेद जहद

दिल लगाने की बात करते हो..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिल लगाने की बात करते हो चोट खाने की बात करते हो ! किस ज़माने का ये भी रोना है किस फ़साने की बात करते हो होके जानाँ ये इतनी क्यूँ हरदम जी जलाने की बात करते हो !! प्यार देते नहीं हो तुम फिर भी प्यार पाने की बात करते हो !! छोड़ कर सारी दुनिया चाहत में डूब जाने की बात करते हो !! क्या इरादा है और क्यूँ आख़िर घर पे आने की बात करते हो ? दिल में लाखों हैं ग़म मगर तुम तो मुस्कुराने की बात करते हो !! मैं तिरे गीत गाता रहता हूँ तुम ज़माने की बात करते हो क्या तसव्वुर हैं ये तुम्हारे 'जहद' लाख आने की बात करते हो !!      ~ जावेद जहद

ग़ालिब है आदमी पर आवारगी सदा से..

        ताज़ा ग़ज़ल ग़ालिब है आदमी पर आवारगी सदा से कैसे बचेंगे फिर हम संसार में ख़ता से ईमां-परस्त हैं जो क़ल्ब-ओ-जिगर, अदा से डरते नहीं हैं हरगिज़ वो कोई भी बला से !! क्या ज़ौक़-ओ-शौक़ थे वो लोगों के कल तलक जी जो होके रह गए हैं इस दौर में फ़ना से !! साहिर भी रहते होंगे बेबस कहीं-कहीं पे हर चीज़ पर न जादू चलता सही तरह से दुनिया में दबदबा है आतिश का आजकल तो शोला बरस रहा है हर वक़्त हर दिशा से !! उलफ़त की राह में तो घायल हुए कभी हम सौदा हुआ कभी और बस हो गए फ़ना से ! अब कारवाँ को रस्ता कैसे दिखाए रहबर भटका हुआ है ख़ुद वो अपने ही रास्ता से दिल से जो शाद होगा इस दौर में ज़रा भी समझो वो बच गया फिर हर रोग हर बला से मोमिन की चाहतों का मुझपर तो फ़ैज़ है ही महरूम मैं नहीं हूँ औरों की भी वफ़ा से !! सोए रहोगे आख़िर कबतक ख़मोशी ताने कबतक नहीं जगो गे अंदर की तुम सदा से तुम तो न राहबर हो, न मीर-ए-कारवां हो फिर किस लिए 'जहद' तुम बनते हो रहनुमा से         ~ जावेद जहद

कभी तो उसकी मोहब्बत का दास मैं भी था..

        ताज़ा ग़ज़ल कभी तो उसकी मोहब्बत का दास मैं भी था झुकाए सर को खड़ा उसके पास मैं भी था ! जिसे समझते हो तुम आज धड़कनें अपनी किसी ज़माने में उसकी तो सांस मैं भी था ! तिरा नसीब था, तुमको जो मिल गई वो भी नहीं तो उसकी मोहब्बत में पास मैं भी था ! दिखाऊँ कैसे मैं सागर की आपको फ़ोटो कि जल की परियों के संग कम-लिबास मैं भी था सँभल गया है मिरा दिल नहीं तो पहले कभी तुम्हारे जैसा कई बुत-शनास मैं भी था !! तुम्हें है तिश्निगी जिसके मिलन की शिद्दत से उसी की तेज़ बड़ी भूख-प्यास मैं भी था !! जबीं झुकाए हुए वो सुपुर्द था मेरे बिछाए दिल को पड़ा उसके पास मैं भी था कि जब था तोड़ा गया प्यार में 'जहद' दिल को अकेले तुम ही नहीं, तब उदास मैं भी था !!         ~ जावेद जहद

मिरे हमसफ़र मिरे साथ चल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं..

        #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मिरे हमसफ़र मिरे साथ चल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं अभी हम चले हैं तो कुछ ही पल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं ये जो रास्ते हैं वफ़ाओं के, बड़े सख़्त और कठिन भी हैं तू ये शौक़ में अभी और ढल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं ! शब-ए-वस्ल पे अभी ख़ुश न हो कि ये लाती है कभी हिज्र भी बड़ा दिन बुरा है ये आजकल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं !! ज़रा ख़ुद को तू भी सँभाल ले, ज़रा ख़ुद को मैं भी सँभाल लूँ अभी दिल मिले ये सँभल-सँभल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं !! अभी तक तो हम मिले ही न थे, अभी मिलके हम हैं चले कहाँ ये शुरू हुआ है सफ़र असल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं !! यही ज़िंदगी जो सरल भी है, यही ज़िंदगी तो कठिन भी है इसी ज़िंदगी में हज़ार छल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं !! यूँ तो चल चुके हैं बहुत 'जेहद', हमें फिर भी लगता है ऐसा क्यूँ कि हैं हम वहीं जहाँ पर थे कल, अभी मंज़िलें बड़ी दूर हैं !!        ~ जावेद जहद

नफ़रत से है क्या मिले, मिले प्यार से प्यार..

         ताज़ा ग़ज़ल नफ़रत से है क्या मिले, मिले प्यार से प्यार आओ लग जाओ गले, मिले प्यार से प्यार नफ़रत से नफ़रत बढ़े, लगे आग हर ओर उलफ़त से हर दिल खिले, मिले प्यार से प्यार झगड़े से झगड़ा बढ़े, अमन-चैन खो जाए झगड़े से फिर क्या मिले, मिले प्यार से प्यार हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई, हर जाति के लोग छोड़ो सब शिकवे, गिले, मिले प्यार से प्यार !! हमदर्दी, ख़िदमत के हों, या चाहत के जीवन में रुक न पाएं सिलसिले, मिले प्यार से प्यार !! मंदिर-मस्जिद के लिए तो लड़ना है बेकार ओ पागल, ओ बावले, मिले प्यार से प्यार जितने भी हैं ज़ुल्म के, जहाँ में 'जहद' आज ढह दो सारे ही क़िले, मिले प्यार से प्यार !!        ~ जावेद जहद

सब किरनों में सबसे प्यारी प्रेम किरन..

        ताज़ा ग़ज़ल सब किरनों में सबसे प्यारी प्रेम किरन सबके मन को है ये भाती प्रेम किरन ! ठंडी-ठंडी, मीठी-मीठी  प्रेम किरन दिल में है ये आग लगाती प्रेम किरन सूरज की किरनें तो बहुत हैं तेज़ मगर करती है दुनिया को अंधी प्रेम किरन ! क्या पाओगे ऐ यारो सन-बाथ में तुम दूर करे है हर बीमारी प्रेम किरन !! जगमग थी इक महफ़िल लेकिन सूनी सी थी लहकी तब, जब उसमें चमकी प्रेम किरन !! रौशन-रौशन इतने सारे चेहरों में है कितने चेहरों की चिकनाई प्रेम किरन पहले तो अच्छी लगती है ख़ूब 'जेहद' फिर ये जीवन भर झुलसाती प्रेम किरन      ~ जावेद जहद

एक ही ज़मीन में दो ग़ज़ल..

        1..ग़ज़ल हर तरफ़ जब है अंधकार बहुत कैसे फिर आएगी बहार बहुत ? इस परेशान से ज़माने को मौसमों की भी अब है मार बहुत इक तरफ़ क़ैद होते हैं कितने इक तरफ़ हो रहे फ़रार बहुत इतनी मुहतात पर भी ये दुनिया हो रही मौत की शिकार बहुत ! हम तो उनसे हैं इसलिए पिछड़े वो हैं हमसे तजुर्बाकार बहुत !! उसको समझो कि मिल गई जन्नत जिसका घर-भर वफ़ाशिआर बहुत आओ आँखें लड़ा के देखें हम किसकी आँखों में है ख़ुमार बहुत अब बताओ कि चाहिए कैसी देख ली आपने बहार बहुत !! वो ज़माना था और ही यारो अब तो दो और दो हैं चार बहुत उसके चेहरे पे सुर्ख़ी रहती है उसके अंदर है शर्म यार बहुत यूज़ इसको करो न जाड़े में सर्द है शरबत-ए-अनार बहुत बाद में उसपे वो सिहरने लगा पहले भड़का ज़मीनदार बहुत उसका उपचार तो ज़रूरी है जो भी शय है 'जहद' बिमार बहुत ***********************      2..ग़ज़ल छा गया जग पे है ग़ुबार बहुत चाहिए पड़नी अब फुहार बहुत लूटता रह गया वो प्यार बहुत उसका प्यारा था व्यवहार बहुत इसलिए है वो बे-क़रार बहुत उसके कांधे पे है जो भार बहुत अब पंहुच वाले नाम करते हैं और पड़े रहते होनहार बहुत तन-बदन टूट जाए है जैसे ज़िंदग...

न पूछो ग़ज़ल से मुझे क्या मिला है..

       ताज़ा ग़ज़ल न पूछो ग़ज़ल से मुझे क्या मिला है कि इसने मुझे फ़िक्र से भर दिया है मिरा देवता भी अजब देवता है वो मुझको बिठा कर मुझे पूजता है बहुत रोज़ से ये ग़ज़ल कहते-कहते लो मैंने भी ख़ुद को गुरू कर लिया है नशे की कोई चीज़ लेता नहीं मैं हूँ फिर क्यूँ नशे में, मुझे क्या हुआ है सिवा दर्द-ओ-ग़म के, मुसीबत, अलम के यहाँ और क्या है, यहाँ और क्या है ?? भुला बैठी दुनिया कि करना है क्या-क्या यही तो वजह कुछ का कुछ हो रहा है !! है किसको पता होने वाला है कल क्या कि ये राज़ तो बस ख़ुदा जानता है !! कभी सुख, कभी दुख, कभी कुछ, कभी कुछ कि जीवन-कथा का यही तो मज़ा है !! ग़ज़ल को हसीं से हसीं करते-करते बहुत शायरी को हसीं कर लिया है ! किसी बज़्म में ये तो जाता नहीं है 'जहद' भी तो शायर अजब सरफिरा है       ~ जावेद जहद

उमड़ते प्यार का नग़्मा, बरसते प्यार का नग़्मा..

50 Ghazals.. दोस्तो ! पेशे-ख़िदमत है इस साइट की पचासवीं ग़ज़ल.. अभी आपलोगों को यहाँ मेरी काफ़ी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी.. सहयोग बनाए रक्खें.. टीका-टिप्पणी भी करते रहें..शुक्रिया 💐         #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 उमड़ते प्यार का नग़्मा, बरसते प्यार का नग़्मा लब-ए-दिलदार से सुनना, गुल-ए-गुलज़ार का नग़्मा कभी लगता है बस अपना ही अपने प्यार का नग़्मा कभी होता गुमां वो सारे ही संसार का नग़्मा !! कभी मामूली सी शय के लिए इंकार का नग़्मा कभी दिल्लो-जिगर और जिस्म-ओ-जाँ बौछार का नग़्मा ये बे-आधार सा लगता है डिस्को, भांगड़ा जैसे ये ठुमरी, भैरवी, मलहार है आधार का नग़्मा !! हमेशा गूँजा करता है तराना अपनी धरती का मगर दम तोड़ देता है समंदर पार का नग़्मा !! हक़ीक़त है ये फ़िल्मों की बहुत दिन से यही यारो कहानी बे-सर-ओ-पा और ये बेकार का नग़्मा !! चहकते प्यार का नग़्मा सभी को हम सुनाते थे सुनाएं किसको अब अपने दिल-ए-बीमार का नग़्मा मोहब्बत चोट खाई तो हमारे दिल से भी निकला बड़े ही दर्द में डूबा ग़म-ए-दिलदार का नग़्मा !! कभी तो हर घड़ी वो प्यार के ही गीत गाते हैं कभी तकरार पे तकरार, बस तकरार का नग़्मा ग़ज़ल से इसलिए मुझको 'जेहद' इ...

वहशी हैं इतने लोग यहाँ, इंसानों की बस्ती में..

      ताज़ा ग़ज़ल वहशी हैं इतने लोग यहाँ, इंसानों की बस्ती में कि लगता है रहते हैं हम तो हैवानों की बस्ती में उलटी-सीधी बातें हैं अब विद्वानों की बस्ती में खो गई सारी दानाई क्या, नादानों की बस्ती में आज जो हालत है जग की बर्बाद ही सबकुछ हो जाता ये अच्छा है इंसान हैं कुछ, शैतानों की बस्ती में !! एक हमें ग़म देता है पास हमारे बैठे-बैठे और एक मसीहा रहता है अंजानों की बस्ती में ख़ाक हुए हर ख़्वाब ही जैसे मेरे दिल की दुनिया के किसने है ये आग लगाई अरमानों की बस्ती में ? या तो ग़म की बात है कोई, या ख़ुशियों का राज़ कोई झूम रही है सारी दुनिया मयख़ानों की बस्ती में !! हैं मेरे दिल में कैसी-कैसी ख़्वाहिशें किस से बोलूँ सब मेरे अपने रहते हैं बेगानों की बस्ती में !! ऐ मेरे सनम दे होश मुझे, जीने का दे जोश मुझे वर्ना यहाँ से ले चल मुझे तू दीवानों की बस्ती में प्यार, वफ़ा के फूल खिलाएं और कलियां मोहब्बत की 'जहद' रक़्स-कुनां हों फिर से ख़ुशियाँ वीरानों की बस्ती में !!        ~ जावेद जहद

प्यार पहले-पहल के आ जाओ..

        #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 प्यार पहले-पहल के आ जाओ ऐ मिरे यार कल के आ जाओ आज मौसम बड़ा सुहाना है घर से बाहर निकल के आ जाओ इश्क़ की झील सूनी-सूनी है ऐ मिरे गुल कँवल के आ जाओ मैं भी आया हूँ झूमते-गाते तुम भी थोड़ा मचल के आ जाओ कुछ न होगा नदी छरहरी है पार इसके सँभल के आ जाओ पहले भी तो बदल के आते थे रास्ता फिर बदल के आ जाओ लाओ इक जाम चाहतों से भरा और तुम उसमें ढल के आ जाओ दौड़ के दूर कुछ चले जाओ फिर हवा में उछल के आ जाओ घुट चुका होगा दम महल में 'जहद' अब तो पीछे महल के आ जाओ !!       ~ जावेद जहद

सदा हलचल भरी रखिए..

        ताज़ा ग़ज़ल सदा हलचल भरी रखिए लहर सी ज़िंंदगी रखिए ! कहानी मुख़्तसर में भी कलाकारी बड़ी रखिए बहारें आती रहती हैं गली दिल की खुली रखिए हो दुश्मन लाख लाग़र सा नज़र उसपर कड़ी रखिए उधर भी जुस्तजू होगी तमन्ना ख़ुद में भी रखिए ये जीवन चक्र जैसा है रवानी ख़ुद में भी रखिए हर इक घर का बदल कर नाम अमन और आशिक़ी रखिए !! बुरा ये दौर है साहब नज़र को जागती रखिए कोई भी हादसा गर हो बहुत दिन न ग़मी रखिए कहीं पे सादगी अच्छी कहीं पे रंगिनी रखिए 'जहद' रौशन जहाँ होगा सुख़न में रौशनी रखिए     ~ जावेद जहद

अँधेरी रात में हमने तो रौशनी की है..

        ताज़ा ग़ज़ल अँधेरी रात में हमने तो रौशनी की है भटकती राह से महफ़ूज़ ज़िंदगी की है वो मेरी ज़िंदगी में इस तरह चला आया कि काली रात में हल जैसे चाँदनी की है किसी का ख़्याल नहीं है, किसी की फ़िक्र नहीं जिसे भी देखो पड़ी अपनी ज़िंदगी की है !! बुराई बढ़ गई, ये बात कह रहे हैं सभी मगर जो देखो तो करनी वही सभी की है फ़साद, जंग, तशद्दुद, फ़रेब, धोखाधड़ी न जाने कौन सी आदत ये आदमी की है मिटेगी कैसे ये ग़ैरों की दुश्मनी हम से जब अपने लोगों से ही हमने दुश्मनी की है ये उनके रुख़ पे जो फैली है शादमानी 'जहद' ये मेरे प्यार की, मेरी ही आशिक़ी की है !!        ~ जावेद जहद

रुत आएगी बहार का तोहफ़ा लिए हुए..

        ताज़ा ग़ज़ल रुत आएगी बहार का तोहफ़ा लिए हुए हम बैठे हैं उमीद की दुनिया लिए हुए ! उम्मीद है तो ज़िंदगी भी ज़िंदाबाद है उम्मीद ही है ज़ीस्त का झंडा लिए हुए झूमेगा, नाचे, गाएगा ये दिल तो ख़ूब ही वो आएंगे जो प्यार का नग़्मा लिए हुए ! उस शख़्स की उदासी कोई क्या बयां करे वो शख़्स है ग़मों का तो सहरा लिए हुए ! इंसान ही तो लाएगा इंसानियत के दिन क्यों आएगा ये कोई फ़रिश्ता लिए हुए कुछ ऐसी वस्तुएं हैं हिफ़ाज़त के नाम पर जो हैं क़यामतों सा ही ख़तरा लिए हुए !! हर शौक़ किसका पूरा हुआ है यहाँ भला हम भी चले ही जाएंगे सपना लिए हुए !! शायर मुझे न समझो ज़रा भी नया-नया अर्सा हुआ है इसमें तो हिस्सा लिए हुए आते हैं कितने लोग 'जहद' रोज़ ही यहाँ आते मगर हैं कम ही करिश्मा लिए हुए        ~ जावेद जहद

दिल में दुख-दर्द का अम्बार लगा है यारो..

        ताज़ा ग़ज़ल दिल में दुख-दर्द का अम्बार लगा है यारो कितना प्यारा ये मोहब्बत का सिला है यारो हँसता-गाता है कोई अब भी मिरे कानों मेंं वो नहीं है मगर उसकी तो सदा है यारो !! फिर कोई अपनी तबाही का तमाशा होगा फिर से दिल में कोई तूफ़ान उठा है यारो ! हमने रोका है बहुत दिल को ग़लत कामों से तब कहीं जाके ये इंसान बना है यारो !! झुक नहीं सकता हर इक दर पे कभी सर मेरा मेरे सजदे में तो बस एक ख़ुदा है यारो !! अब कोई चाहे ग़लत काम करे या न करे कितनों को इसका भी ईनाम मिला है यारो कैसे मेहनत से कोई जान चुराता है 'जहद' अपना जीवन तो बस इसपर ही टिका है यारो        ~ जावेद जहद

तेरी ख़ुश्बू कली में, फूलों में..

        ताज़ा ग़ज़ल तेरी ख़ुश्बू कली में, फूलों में तेरी रंगत है चाँद, तारोंं में !! गुफ़्तगू तेरी सारी ग़ज़लों में ज़िक्र तेरा है सब फ़सानों में तेरी मस्ती, ख़ुमार सुब्हों में तेरा रक़्स-ओ-सुरूर शामों में ख़ुश नज़ारों में है हँसी तेरी तेरी शोख़ी खिली बहारों में बज़्म-ओ-महफ़िल में रौनक़ें तेरी तेरी हलचल लहर में, धारों में !! तेरी बोली तो बोले हर पंछी तेरी झंकार झनके साज़ों में तेरी पूजा ज़माना करता फिरे तेरी चाहत तो ख़ास, आमों में तेरी तारीफ़ क्या करे ये 'जहद' अंगिनत गुण तिरी अदाओं में !        ~ जावेद जहद

अभी तो दिल पे मिरा इख़्तियार बाक़ी है..

         ताज़ा ग़ज़ल अभी तो दिल पे मिरा इख़्तियार बाक़ी है अभी तो इश्क़ की सारी बहार बाक़ी है ! वो आएंगे तो लुटाएंगे  गुल वफ़ाओं के किसी का दिल को मिरे इंतज़ार बाक़ी है नज़र-नज़र में मोहब्बत की होंगी बरसातें निगाह-ए-मस्त की मय की फुहार बाक़ी है कोई तो दिल को मिरे आके कर दे दीवाना कि होश वालों में अपना शुमार बाक़ी है !! गया है जबसे पिला के वो जाम नज़रों से मिरी इन आँखों में उसका ख़ुमार बाक़ी है भले ही ज़िंदगी दुश्वार  हो गई सब की पर अब भी इश्क़ का तो कारोबार बाक़ी है कि जाओ चाँद से जाकर ये बोल देना 'जहद' करेंगे हम जो तिरा वो सिंगार बाक़ी है !!        ~ जावेद जहद

फूल जैसी कभी खिले दुनिया..

      ताज़ा ग़ज़ल फूल जैसी कभी खिले दुनिया कभी पतझड़ नुमा लगे दुनिया जाने क्या हो गया है दुनिया को बुरे को भी भला कहे दुनिया !! कितने रोगों को ख़ुद ही पाला है बैठ के अब दवा करे दुनिया !! आसमां ढाता ही रहेगा क़हर मरती है तो मरा करे दुनिया ! सहती आई है ये अज़ल से ही और कितना सितम सहे दुनिया इसके जैसी बुराई हो न वहाँ अब अगर दूसरी बसे दुनिया फ़िक्र जिनको नहीं है दुनिया की उनके पीछे न ये चले दुनिया !! है तरक़्क़ी पे कितनी राज़ खुले जब मुसीबत में ये फंसे दुनिया हाल कैसा है जग का क्या बोलें एक दूजे पे सब हँसे दुनिया !! कैसे होगा सुधार दुनिया में कितना हंगामा और करे दुनिया अब 'जेहद' छोड़े न सभी उनपर फैसला ख़ुद भी कुछ करे दुनिया     ~ जावेद जहद

फिर ख़िज़ाँ छाने लगी, बढ़ने लगा है दर्द फिर..

            ताज़ा ग़ज़ल फिर ख़िज़ाँ छाने लगी, बढ़ने लगा है दर्द फिर लेके आया है ये मौसम अपना चेहरा ज़र्द फिर फिर से हावी हो गई हैवानियत चारों तरफ़ सारी बातें पड़ गईंं इंसानियत की सर्द फिर फीकी-फीकी सारी मस्ती, सारी महफ़िल बेचमक ज़िंदगी की हर ख़ुशी पे जम रही है गर्द फिर !! औरतें ही राह में जब गुल खिलाती फिर रहीं तो बिचारे क्या करें ये, मर्द तो हैं मर्द फिर !! एकता की बात थी, सब एक होने आए थे जाने फिर क्यों लड़ पड़े सब आपसों में फ़र्द फिर उठ रहा है प्यार से उसका क़दम फिर से 'जहद' लगता है वो आ रहा है दिल को देने दर्द फिर !!               जावेद जहद

दिन-ब-दिन और भी ये बिगड़े गी..

        ताज़ा ग़ज़ल दिन-ब-दिन और भी ये बिगड़े गी इस जहाँ की फ़िज़ा न सुधरे गी ! ये बदी आज तक किसी से जब रुक न पाई तो किस से ठहरे गी आज ग़मगीन सा नज़ारा है कुछ बला तो ज़रूर गुज़रे गी सब उसे नेक मान बैठे थे किसने सोचा कभी वो झगड़े गी मुंजमिद सी है प्यार की धारा जाने कब टूट कर ये उमड़े गी बे-अमाँ दह्र जब दमकती है अम्न हो तो ये और निखरे गी ज़िंदगी का मज़ा तो देख लिया देखें अब मौत कैसे जकड़े गी अभी नफ़रत भरी है चारों तरफ़ कभी उलफ़त भी ज़ोर पकड़े गी आह ! तब न रहेगा कुछ बाक़ी रोज़-ए-महशर जो दह्र उजड़े गी ये कभी ख़त्म न 'जहद' होगी ज़िंदगी फिर कहीं पे गुज़रे गी      जावेद जहद

यूँ तो मेरी ज़िंदगी में आज तुम शामिल हुए..

             #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 यूँ तो मेरी ज़िंदगी में आज तुम शामिल हुए हाँ मगर पहले से हैं दो दिल सनम इक दिल हुए तेरी-मेरी आशिक़ी का है ये रिश्ता तय-शुदा दो सितारे आसमां में कबसे हैं झिलमिल हुए कैसा तेरा प्यार है ये, कैसी तेरी क़ुर्बतें हम ज़माने वालों से और ख़ुद से भी ग़ाफ़िल हुए तुम हमारे साथ न थे तो कोई साहिल न था तुम हमारे पास आए और मिरे साहिल हुए ! जबसे तूने हुस्न अपना नाम मेरे कर दिया तबसे हम भी साथ तेरे रौनक़-ए-महफ़िल हुए दिल से दिल का मेल भी तो  क़िस्मतों का खेल है कितने आशिक़ डूबे इसमें कितने ही झिलमिल हुए इश्क़ में तुम चोट खाके  मुस्कुराते फिर रहे तुम भी ये कैसे 'जहद' घायल हुए, बिस्मिल हुए            #जावेद_जहद

आपका ये ख़त जो आया, शुक्रिया..

          #ताज़ा_ग़ज़ल आपका ये ख़त जो आया, शुक्रिया ! प्यार का पैग़ाम लाया , शुक्रिया !! कह न पाता मैं तो हाल-ए-दिल कभी आपने ही दिल बढ़ाया, शुक्रिया !! मेरी भी आँखों में देखो क्या हसीं चाँद कोई जगमगाया, शुक्रिया !! मुझको हर ऐब-ओ-हुनर के साथ में आपने अपना बनाया, शुक्रिया !! आपने पहले मुझे आशिक़ किया फिर मुझे शायर बनाया, शुक्रिया बात कोई मुझमें भी तो ख़ास है आपने मुझको बताया, शुक्रिया ऐ ग़ज़ल तेरी मोहब्बत में 'जहद' क्या कहे,क्या-क्या न पाया, शुक्रिया       #जावेद_जहद

ग़म से कभी हटे,न तो लिपटे ख़ुशी से हम..

         #ताज़ा_ग़ज़ल ग़म से कभी हटे, न तो लिपटे ख़ुशी से हम बस आँख ही लड़ाते रहे ज़िंदगी से हम !! छूते रहे बुलंदियां ख़्यालों के ज़ोर पर बनते रहे सुख़न के यूँ 'ग़ालिब' 'वली' से हम शेर-ओ-सुख़न में जान हमारी ग़ज़ल से है और हैं जमे ग़ज़ल की तो जादूगरी से हम आदत सी पड़ गई है जो ग़ज़लें सुनाने की कैसे रहें ज़माने से अब अजनबी से हम ? उस शह्र के रिवाज से मिलता नहीं मिज़ाज करते हैं प्यार फिर भी बहुत मुम्बई से हम ! कितनी भी हो सियाही भटक न सकेंगे हम रौशन हैं ऐसे ईमाँ भरी रौशनी से हम !! हम से अगर कोई भी हो जाए ख़फ़ा 'जहद' उसको मना ही लेंगे बड़ी आजज़ी से हम !!           #जावेद_जहद

एक ही ज़मीन में तीन ग़ज़लें..

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      1_ग़ज़ल ज़िंदगी में है इंतिशार बहुत मिलेगा कैसे फिर क़रार बहुत जाने कैसे ये आ गई ख़ुश्की फल वफ़ा के थे आबदार बहुत हमें तो आपसे है बैर नहीं आप ही को मगर है खार बहुत दिल, जिगर, रूह तक असर इसका इस क़लम की है तेज़ धार बहुत !! मौज ग़ज़लों की भाई क्या कहना इस नदी के हैं आबशार बहुत !! क्या पता उसको मेरा है कितना है मुझे जिसका इंतज़ार बहुत !! इन दिनों कोई मुझसे रूठा है इन दिनों हूँ मैं सोगवार बहुत मेहनती लोगों के लिए जग में हर जगह ही हैं रोज़गार बहुत उसकी पिक्चर में बस तशद्दुद था कर गई कैसे कारोबार बहुत ?? मैं जलाऊंगा क्या तुम्हें जानम तुम तो ख़ुद ही हो शोलाबार बहुत शायरी अपनी भी लो मश्क़ी से बन गई देखो पायदार बहुत !! बन न पाए जो दिन हसीन 'जहद' तो शब-ए-ग़म को ही सँवार बहुत **************************      2_ग़ज़ल जब जहाँ में भरा था प्यार बहुत वो ज़माना था शानदार बहुत !! अब तो गिनती के रह गए जैसे अबसे पहले थे बा-वक़ार बहुत अब के ऐसी घटी हैं घटनाएं अब के दुनिया है शर्मसार बहुत जब हमारी थी ज़िंदगी फ़ितरी तब हक़ीक़त में था क़रार बहुत वो जिसे चाहे ख़ाक कर डाले उसका जलवा है शोलाबार बहुत पश्...