ज़ुल्म का फैला हुआ शग़्ल है चारों तरफ़..
ताज़ा ग़ज़ल ज़ुल्म का फैला हुआ शग़्ल है चारों तरफ़ दर्द में डूबी हुई शक्ल है चारों तरफ़ !! अब कोई फ़न-आर्ट हो या कोई तकनीक हो दनदनाती फिर रही नक़्ल है चारों तरफ़ !! नफ़रतें दिल में लिए अब गले मिलते हैं लोग अस्ल में अब नाम का वस्ल है चारों तरफ़ !! ये जहाँ आज़ाद है अब तो सारा ही मगर हर किसी का कुछ न कुछ दख़्ल है चारों तरफ़ नफ़रतों की आग में सिर्फ़ जलती ही नहीं गोली से भी भुन रही नस्ल है चारों तरफ़ उलझनों का जाल अब इस तरह है बिछ चुका उलझनों में क़ैद सी अक़्ल है चारों तरफ़ !! अब तो सारी दुनिया की आज के माहौल में एक जैसी ही 'जहद' शक्ल है चारों तरफ़ !! ~ जावेद जहद