दिल-जिगर से और जिस्म-ओ-जान से..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐 दिल-जिगर से और जिस्म-ओ-जान से चाहता हूँ मैं तुझे ईमान से ।। ज़िंदगी जीना था चाहा जिसके साथ मार डाला उसने मुझको जान से ।। यूँ छलकती मय है उनकी बज़्म में हम हुए जाते हैं वाँ बेजान से ।। ऐसी कुछ है परदे वाली बात जी हम जिसे कहते नहीं नादान से । सर्द-मुहरी देख कर तूफ़ान की रह गए हम तो बहुत हैरान से । कब दशा बदले गी मेरे देश की पूछता हूँ मैं सियासतदान से ? भूल जाते क्यों हो अपना वादा तुम ये ख़ता हो जाती है या जान से ? इससे बढ़कर कोई भी पूजा नहीं प्यार और उलफ़त करो इंसान से फड़फड़ाता है 'जेहद' क्यों दिल मिरा फिर ये मिलने जाएगा क्या जान से ? जावेेद जेेेहद करन सराय, सासाराम, बिहार