जो थी तिरे बदन में वो ख़ुश्बू कहीं नहीं..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
जो थी तिरे बदन में वो ख़ुश्बू कहीं नहीं
ग़ुंचों में, गुल, कली में किसी सू कहीं नहीं
तेरी नज़र के बाद मिरे दिल पे आज तक
डाला किसी नज़र ने भी जादू कहीं नहीं
इस दिल को नर्म छांव सा देता था जो क़रार
मेरे लिए वो साया-ए-गेसू कहीं नहीं !!
इक तेरे ग़म के बाद किसी ग़म में आजतक
सावन की तर्ह बरसे ये आंसू कहीं नहीं !!
जी चाहता है सांसों को मिलती रहे यूँ ही
तेरे मिलन की ख़ुश्बू सी ख़ुश्बू कहीं नहीं
यूँ तो हैं बेशुमार ही दुनिया में लज़्ज़तें
पर लुत्फ़ जितना तेरे है पहलू कहीं नहीं
इस दिल में बस तुम्हारी सनम यादें रह गईंं
इसके अलावा साथ मिरे तू कहीं नहीं !!
वो आँखें जिनमें साफ़ चमकते थे कल 'जहद'
उन में वफ़ा के अब तो वो जुगनू कहीं नहीं !!
~ जावेद जहद
Comments