जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है..
ताज़ा ग़ज़ल जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है और मुझे उसकी तो आदत पे हँसी आती है वो न मिलते हैं, न मिलने ही हमें देते हैं उनकी इस गंदी सियासत पे हँसी आती है शादमानी में कभी रोना बहुत आता है और कभी दर्द-मुसीबत पे हँसी आती है यूँ भी होता है कभी ज़िंदगी की राहों में रोना आता है न क़िस्मत पे हँसी आती है उससे हो जाती है थोड़ी सी कमाई उसकी इसलिए उसको तो मय्यत पे हँसी आती है तू तो सबकुछ ही बहुत उम्दा हसीं चाहे है ऐ मिरे दिल, तिरी हसरत पे हसीं आती है माहिर-ए-फ़न से भी लग़ज़िश कभी हो जाती है ये भी क़ुदरत है तो क़ुदरत पे हँसी आती है !! झूट का सपने में भी कुछ न बनाओ यारो झूट की सारी इमारत पे हँसी आती है !! जो मिले जुर्म, गुनाहों के 'जहद' बदले में ऐसी तो इज़्ज़त-ओ-शोहरत पे हँसी आती है जावेेद जहद