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Showing posts from December, 2020

इक शम्मा और परवाने दो..

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           ताज़ा ग़ज़ल इक शम्मा और परवाने दो ! चलो एक को जल जाने दो ! बहुतों को मारा है उसने अब उसको भी मर जाने दो सरहद को पंछी क्या जानें बिन रोके आने-जाने दो !! बहुत दिनों की प्यास है साक़ी पैमाने पर पैमाने दो !! सर बहुत चढ़ाया है उनको अब दुश्मन को इतराने दो तुम बाद में दूरी कर लेना ज़रा पहले पास तो आने दो जो जिनकी यारी चाहे हैं उन्हें उनके ही याराने दो जो बर्बादी के सामाँ हैं अब दफ़्न उन्हें हो जाने दो हम सबका स्वागत करते हैं जो आता है उसे आने दो ! फिर होश मिरा तुम ले लेना ज़रा पहले होश तो आने दो दिल जिसको चाहे ख़ूब 'जहद' उसपे ही उसे लुट जाने दो !!                जावेेद जहद

ज़माना है बुरा, सरकार से भी कुछ नहीं होता..

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           ताज़ा ग़ज़ल ज़माना है बुरा, सरकार से भी  कुछ नहीं होता किसी को डर ख़ुदा की मार से भी कुछ नहीं होता भला, मेहर-ओ-वफ़ा, ईसार से भी कुछ नहीं होता कि अब तो आजज़ी और प्यार से भी कुछ नहीं होता वो न चाहे अगर तो उसके दिल में फिर किसी सूरत हज़ारों प्यार के इज़हार से भी कुछ नहीं होता !! वो बाँहों में चला आए तो फिर कुछ बन ही आता है फ़क़त महबूब के दीदार से भी कुछ नहीं होता !! जो होना हो अगर तो प्यार से भी हो ही जाता है नहीं तो तोप से तलवार से भी कुछ नहीं होता !! ये मुमकिन है ग़ज़ल मेरी सधारण सी ही लाए रंग असर लोगों में अब मेआर से भी कुछ नहीं होता ! किसी मुफ़लिस ने जबसे मुफ़लिसी से दिल लगाया है उसे ज़र-माल के अम्बार से भी कुछ नहीं होता !! उजड़ जाए किसी के दिल के गुलशन की जो शादाबी उसे फिर रौनक़-ए-गुलज़ार से भी कुछ नहीं होता !! ये बातें हैं उसूलों और मिज़ाजों की 'जहद' अपने कि मेरा दिल ख़फ़ा अग़यार से भी कुछ नहीं होता                 जावेेद जहद

आशिक़, मजनूँ, दीवाना था..

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         #ताज़ा_ग़ज़ल आशिक़, मजनूँ, दीवाना था मैं तेरे लिए क्या- क्या ना था बस प्यार की बातें होती थीं अपना भी वो क्या ज़माना था दिल मेरा  प्यासा था तेरा आँखों का तिरी पैमाना था हर रात शमा तू बनती थी मैं बन जाता  परवाना था हम सारी हद से गुज़र जाते बस रौ में हमें बह जाना था जो प्यार में  गाते रहते थे कितना वो प्यारा गाना था तूने ही कभी  मौक़ा न दिया क्या-क्या तुमको बतलाना था ख़्वाबों की परी थी, हो गई छू उड़ जाने का तो बहाना था !! महलों से उठी चिंगारी थी और ख़ाक हुआ काशाना था ये नफ़रत, वो उलफ़त का 'जहद' इक ये है, इक वो ज़माना था !!                       जावेेद जहद

जिसका दिल ग़म से भरा रहता है..

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          ताज़ा ग़ज़ल जिसका दिल ग़म से भरा रहता है वो तो मज़बूत  बड़ा  रहता  है !! बात तो करता है वो सेवा की पर लुटेरा ही  बना  रहता  है वो हमें राह  दिखाए कैसे ख़ुद फँसा राहनुमा रहता है जो नज़र आते हैं ख़ुशहाल बहुत हाल उनका भी  बुरा  रहता  है ! वस्ल के फूल बिखर जाते हैं हिज्र का ज़ख़्म  हरा रहता है उनसे जितना भी मिला जाए मगर उनके होंठों पे  गिला  रहता  है !! जाने क्यों भीड़ से वो भागे है जाने क्यों तन्हा  सदा रहता है ख़ाक में जिस्म तो मिल जाते हैं रूह का जलवा  सदा रहता है ! आके फिर धड़कनों को बढ़वा दो दिल का सीमाब  घटा रहता है !! शेर कहते रहो हर वक़्त 'जहद' इस तरह ज़ह्न  खुला रहता है !                  जावेेद जहद

मत पूछिए कि ग़ज़लों से क्या-क्या बना लिया..

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            #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मत पूछिए कि ग़ज़लों से क्या-क्या बना लिया इस फ़न से सारी दुनिया को अपना बना लिया मुश्किल सुख़न से होती है उलझन सभी को अब आसान मैंने इस लिए लहजा बना लिया !! सच बात वो कहें तो कहें कैसे दोस्तो दिल में तो उनके झूठ ने डेरा बना लिया तुम भी तो हो गए हो किसी हुक्म के ग़ुलाम हमने भी इक सदा को है आक़ा बना लिया ! आपस के मस्अलों में ये ग़ैरों का दख़्ल क्यों ऐ दोस्त तूने कैसा तरीक़ा बना लिया ? कुछ ऐसे शौक़ में सभी लोगों ने डूब कर अब ख़ुद को इक तरह से है तन्हा बना लिया करते ही जा रहे हैं सितम पे सितम 'जहद' लोगों ने कैसा-कैसा मसीहा बना लिया !!               जावेेद जहद 

आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा..

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               #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 आग, पानी, चाँदनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा है यही तो  ज़िंदगी,  रौशनी, ख़ुश्बू, हवा तीरगी, बदबू, उमस, ज़िंदगी की बेकली ज़िंदगी की चाशनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा इक जगह जब हों ये तो सुर सजे संगीत का ये भी जैसे रागिनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! आज कोई जश्न है या किसी का वस्ल है आज कितनी है खिली, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा तुम थे मेरे साथ तो कितनी मेरे पास थी तुम गए तो खो गई, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा इक फ़रेबी हुस्न और मसनवी श्रृंगार है शह्र में न गाँव सी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा ! अंगिनत अल्फ़ाज़ हैं, अंगिनत मौज़ू मगर किसकी है न शायरी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा ये यहाँ की शय नहीं, इसमें कोई शक नहीं ये तो हैं जी जन्नती, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! कहते हैं क्या-क्या सभी, मैंने भी ये कह दिया इल्म और शाइस्तगी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !! तेज़ भाती है किसे, हर किसी को ही 'जहद' अच्छी लगती गुनगुनी, रौशनी, ख़ुश्बू, हवा !!                  जावेेद जहद सहसरामी

तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे..

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        ताज़ा ग़ज़ल तुम्हारी क्या वफ़ा है, हम नहीं समझे लहर,आंधी है क्या है, हम नहीं समझे ये सब कैसी अदा है, हम नहीं समझे मिलन में लब सिला है, हम नहीं समझे तुम्हारे भेद तो हैं  सारे ही न्यारे तुम्हारा रूप क्या है, हम नहीं समझे हमारी क्या लगन है, जानते हो तुम तुम्हारी चाह क्या है, हम नहीं समझे तड़पता है तुम्हारा दिल मिलन को जब क़दम फिर क्यों रुका है, हम नहीं समझे तुम्हें हम भूलना तो  चाहते हैं पर तुम्हीँ में दिल लगा है, हम नहीं समझे बहुत नज़दीक से देखा मगर फिर भी मोहब्बत क्या बला है हम नहीं समझे ये कैसा है सियासत का जहाँ यारो कि इसका धर्म क्या है, हम नहीं समझे किसी की लूट कर इज़्ज़त 'जहद' आख़िर किसी को क्या मिला है, हम नहीं समझे !!                   जावेेद जहद सहसरामी

वो दर्द है दिल में जो कभी कम नहीं होता..

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          ताज़ा ग़ज़ल वो दर्द है दिल में जो कभी कम नहीं होता ऐसा तो किसी का भी कोई ग़म नहीं होता चारों ही तरफ़  झगड़ा-लड़ाई  है जहाँ में क्यों दूर जहालत का ये आलम नहीं होता दुनिया की नज़र में वो कभी शेर न बनता इतना जो भरा उसके यहाँ बम नहीं होता बेबस है  जहाँ सारा  सितम वालों  के आगे है कहने की अब बात कि सर ख़म नहीं होता हर शय की तरह शायरी भी हो गई बेजान अब शेर में पहले की तरह  दम नहीं होता है उसकी मोहब्बत की हसीं याद मिरे पास पर साथ मिरे अब तो वो हमदम नहीं होता उनका नशा तो उनसे बिछड़ के भी 'जहद' जी कम होता है, पर ख़त्म ये इकदम नहीं होता !!                   #जावेेद_जहद_सहसरामी

मोहब्बत अब दिलों में इस तरह कम होती जाती है..

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          ताज़ा ग़ज़ल मोहब्बत अब दिलों में इस तरह कम होती जाती है  कि जैसे  धूप में ये ख़ुश्क  शबनम  होती  जाती  है ये कैसी  छिड़ गई है  हर तरफ़ ही  जंग दुनिया में बिछी जाती हैं लाशें, आँख पुर-नम होती जाती है तुम्हारे चाँद, सूरज  और सितारे  बुझते जाते हैं तिरी दुनिया भी क्या ग़म का ही आलम होती जाती है हमारी शक्ल से तुम जितनी नफ़रत करते जाते हो हमें उतनी मोहब्बत तुमसे जानम होती जाती है !! बस इक बचपन का मौसम होता है जी शादमानी का उमर बढ़ती है ज्यों ज्यों दफ़्तर-ए-ग़म होती जाती है  कोई आराम से  करता है शायर  शायरी कैसे यहाँ तो कुछ न कुछ तख़्लीक़ हरदम होती जाती है तरक़्क़ी करती जाती है 'जहद' ये देखिए जितनी ये दुनिया और भी जैसे जहन्नम होती जाती है !!                    #जावेेद_जहद

दिल-जिगर, जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम..

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             ताज़ा ग़ज़ल दिल-जिगर, जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम तुम हो जानाँ बड़ी हसीं मासूम !! चाँद, तारे, परिंदे, झील, कँवल कोई तुमसा लगे नहीं मासूम ! शोख़, चंचल, शरीर, ढीठ कहीं और नज़र आती हो कहीं मासूम तुमको मिलती जहाँ है मासूमी आओ चलते हैं हम वहीं मासूम ग़ुस्से में इन लबों को मत भींचो खेलती है हँसी  यहीं मासूम !! वो बड़ा ही नसीब वाला है जिसका दिलवर हो दिलनशीं मासूम आज ऐसे 'जहद' ये बदला रूप जैसे ये था कभी नहीं मासूम !!                  #जावेेद_जहद

दिल को लगे हैं छलने लोग..

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        ताज़ा ग़ज़ल दिल को लगे हैं छलने लोग पराए  जैसे  अपने  लोग !! इन ऊँचे क़द वालों में कैसे-कैसे बौने लोग ! चोर, लुटेरे, हत्यारे अब तो लगे हैं बनने लोग सुनके उसकी तक़रीरें सब आग लगे उगलने लोग उसने तरक़्क़ी ख़ुद पाई और लगे सब जलने लोग अक्सर तब आता है तरस लगते हैं जब मरने लोग !! आए थे यहाँ क्या करने और लगे क्या करने लोग हरगिज़ ज़ेब नहीं देते अच्छे पद पे गंदे लोग 'जहद' किसी का कोई नहीं और किसी के कितने लोग              जावेेद जहद

यहाँ, वहाँ दिल-नज़र का मंज़र..

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              ताज़ा ग़ज़ल यहाँ, वहाँ दिल-नज़र का मंज़र मोहब्बतों के सेहर का मंज़र !! तिरी अदा तो है जैसे जानम क़दम-क़दम पे लहर का मंज़र हसीन ये भी लगे है कितना ख़िज़ाँ-रसीदा शजर का मंज़र नगर-नगर में, शहर-शहर में डगर-डगर में ग़दर का मंज़र तरह-तरह के ख़ुदा ये तेरे अजब-ग़ज़ब से बशर का मंज़र सँवर गया है या और यारो बिगड़ गया इस दहर का मंज़र शजर में अपने सजा रहा हूँ हसीं-हसीं से शजर का मंज़र छुपा-छुपा कुछ, अयाँ-अयाँ कुछ अजब है मेरे सफ़र का मंज़र !! बशर-बशर में 'जहद' अदावत नज़र-नज़र में शरर का मंज़र              जावेेद जहद

इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र..

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            ताज़ा ग़ज़ल इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र मस्त है ये तो सेहर का मंज़र रौशनी बिन ही चमकते तारे ख़ूब ये रब के हुनर का मंज़र रक़्स में ये तो है जाने कब से शाम-ओ-शब और सहर का मंज़र कितना वो प्यारा, सुहाना कितना भूले-बिसरे से सफ़र का मंज़र !! अपने तो फ़न में नज़र आता है मीठे-मीठे से समर का मंज़र !! सुर्ख़ हैं उनके कली, गुल, बूटे सब्ज़ है जिनके शजर का मंज़र आज है ऐसा तो कल क्या होगा फ़िक्र में डूबे बशर का मंज़र !! आज ये हाल 'जहद' है जग का चारों ही सिम्त शरर का मंज़र !!                जावेेद जहद

अंधी ग़ज़ल, बहरी ग़ज़ल, लूली ग़ज़ल, लँगड़ी ग़ज़ल..

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          ताज़ा ग़ज़ल अंधी ग़ज़ल, बहरी ग़ज़ल, लूली ग़ज़ल, लँगड़ी ग़ज़ल इस दौर में बनने लगी अब हर तरह की ही ग़ज़ल !! इतनी तरह की बन चुकी हैं ग़ज़लें अबतक दोस्तो जैसी ज़मीं में भी कहो लगती है वो तरही ग़ज़ल !! वो जैसे उस रक़्क़ासा के थी नाम लिक्खी जा चुकी हर शाम उसके साथ में लहरा के वो थिरकी ग़ज़ल वैसी ही कहता है वो जिसका होता है जैसा मिज़ाज कोई कहे संजीदा और कोई कहे बहकी ग़ज़ल !! मैं जैसा था वैसा रहा कितने ही सालों-साल तक पर ग़ज़लों को करता रहा छोटी कभी लम्बी ग़ज़ल अच्छा कहा दुख-दर्द को, ख़ुशियों-बहारों को बुरा समझो कि मैं कहता रहा बस उल्टी-सीधी ही ग़ज़ल जबसे वो फ़िल्मों में गया जाने उसे क्या हो गया पहले वो अदबी कहता था, अब लिखता है फ़िल्मी ग़ज़ल अबतक ये जितने दौर से गुज़री तो गुज़री शान से सागर की लहरों की तरह लहराती ये लहरी ग़ज़ल ख़ून-ए-जिगर से लिखते हैं सारे सुख़नवर ही इसे अल्ल करे मक़बूल हो बे-इंतिहा सब की ग़ज़ल ! कितनी उड़ानेंं भरके तो बनती ग़ज़ल है इक 'जहद' पर वो पड़ी रहती कहीं, वो भी कहीं उड़ती ग़ज़ल !!                  जावेेद जहद

एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी..

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            ताज़ा ग़ज़ल एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी इक बनाई ग़ज़ल तो बनी "तेवरी" यूँ तो थी दिलनशीं सर से वो पैर तक पर मुझे उसकी अच्छी लगी तेवरी !! कल तलक तेवरों से भरे जो भी थे आज उनकी भी ठंडी पड़ी तेवरी ! लोग सारे ज़माने को कर देते ठीक पर न अबतक सही से चढ़ी तेवरी जिनकी रहती है ठंडी सितम के ख़िलाफ़ वो रहेगी  मरी की  मरी  तेवरी !! एक हीरो मरा तो हुआ क्या नहीं लोग भूखे मरे न चढ़ी तेवरी !! तुम न पूछो मिरी शायरी का मिज़ाज जाने कैसी है मेरी अभी तेवरी !! "तेवरी" जब लिखो तो रहे ये ख़याल हो विरोधों के रस से भरी  "तेवरी" ये ज़रूरी नहीं दिलनशीं हो 'जहद' चाँद-तारों से उनकी भरी तेवरी !!                जावेेद जहद

मत पूछिए ग़ज़ल से क्या-क्या बना लिया..

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            #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मत पूछिए ग़ज़ल से क्या-क्या बना लिया इस फ़न से हर नज़र को अपना बना लिया मुश्किल सुख़न से होती हैं सबको उलझनें आसान इस लिए ही लहजा बना लिया !! सच बात लब पे आए अब कैसे दोस्तो दिल में तो झूट ने है डेरा बना लिया !! तुम भी तो हो गए हो इक हुक्म के ग़ुलाम हमने भी इक सदा को आक़ा बना लिया ! आपस के मस्अलों में ग़ैरों का दख़्ल क्यों ऐ दोस्त तूने ये क्या धंधा बना लिया ?? कुछ ऐसे शौक़ में अब लोगों ने डूब कर ख़ुद को है इक तरह से तन्हा बना लिया देते ही जा रहे हैं दुनिया को दर्द-ओ-ग़म दुनिया ने कैसा-कैसा नेता बना लिया !! छोड़ा 'जहद' किसी को तो छोड़ ही दिया रिश्ता बना लिया तो रिश्ता बना लिया !!                 जावेेद जहद

हम सेहतयाब न अब कोई दवा से होंगे..

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           #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 हम सेहतयाब न अब कोई दवा से होंगे अपने दुख दूर तो ग़ज़लों की ग़िज़ा से होंगे अब कोई साज़ भी हमको तो नहीं भाएगा हम तो पागल तिरी पायल की सदा से होंगे उनके पहलू की जगह होगी मिरा बाग़ हसीं और गेसू घने मुझपे तो घटा से होंगे !! तू अगर तोड़ गया प्यार भरा दिल तो बता हम ख़फ़ा तुझसे या तेरी वो जफ़ा से होंगे क्या कहें इश्क़ की वो पहली हवा कैसी लगी आप तो मिल ही चुके बाद-ए-सबा से होंगे !! हम तिरे पास तो रह कर भी सनम प्यासे हैं तुझसे हैं दूर जो कितने वो पियासे होंगे !! इस जहाँ से ये 'जहद' भर गया जो दिल मेरा फिर तो रिश्ते मिरे सारे ही ख़ुदा से होंगे !!               जावेेद जहद

रात भर सांसों में कुछ महका बहुत..

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          ताज़ा ग़ज़ल रात भर सांसों में कुछ महका बहुत याद आया फूल सा चेहरा बहुत !! क्या सदा थी वो कि ये दिल मुज़्तरिब जानिब-ए-दर बारहा लपका बहुत !! वो मिला ऐसे कि सांसें बढ़ गईं और दिल भी ज़ोर से धड़का बहुत उसने जो मुझको दिया पहले-पहल क़ीमती था प्यार का तोहफ़ा बहुत ! मयकदे से इक तिरे जाने के बाद साक़िया, लगते हैं सब तन्हा बहुत मुझमें जाने ऐसी क्या हैं ख़ूबियाँ याद करती है मुझे दुनिया बहुत आ भी जाओ अब 'जहद' तुम सामने छुप-छुपा के हो गया पर्दा बहुत !!               जावेेद जहद

या ख़ुदा, कैसा है ये दिन आया..

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        ताज़ा ग़ज़ल या ख़ुदा, कैसा है ये दिन आया हर तरफ़ दर्द-ओ-ग़म का है साया हाए कमज़र्फ़ ये तिरा अशरफ़ अर्श से फ़र्श पे चला आया !! पा लिया मैंने जैसे सबकुछ ही फिर भी रहता है दिल ये घबराया बुझता जाता है दीप ख़ुशियों का बढ़ता जाता है दर्द का साया !! जाने कबतक रहेगा मंडराता ये तशद्दुद, ये जंग का साया ! हो गई दिल की सब नमी ग़ायब सारे रिश्तों का फूल मुरझाया !! आओ तहज़ीब-ए-नव पे ये सोचें "हमने क्या खोया, हमने क्या पाया" दिल को कितना सुकून देता है ये मुहब्बत, ये प्यार का साया ! अब 'जहद' ऐसी तुम ग़ज़ल लिक्खो जिस से दुनिया की दूर हो माया !!              #जावेेद_जहद

उनकी आँखें मय भरी और मिरा दीवाना दिल..

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            ताज़ा ग़ज़ल उनकी आँखें मय भरी और मिरा दीवाना दिल पीते-पीते पी गया  सारा ही  मयख़ाना दिल !! उनसे मिलते ही नज़र हाए ये दीवाना दिल मुझसे ही लो हो गया  मेरा ये बेगाना दिल  महफ़िलों में आज फिर कैफ़-ओ-मस्ती के लिए ढूँढता है आँखों से  पीने का पैमाना दिल !! मस्ती में लहराता था , गीत गाता था बहुत दुख लगा तो भूल बैठा  ये सारा गाना दिल काम अपना आँखों से  कर गुज़रता है ये तो सोचो क्या-क्या जाने है ये भी तो कर जाना दिल देखने में छोटा सा  ये तो लगता है 'जहद' है हक़ीक़त में मगर इक बड़ा तहख़ाना दिल                   जावेेद जहद

मैं तुझे फिर से मिलूँ या न मिलूँ..

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         #ताज़ा_ग़ज़ल मैं तुझे फिर से मिलूँ या न मिलूँ घर तिरा  याद  रखूँ या न रखूँ  प्यार का क़िस्सा अभी बाक़ी है मैं उसे  पूरा करूँ  या न करूँ साथ तेरे  किसी को देखा है ऐसे मंज़र पे जलूँ या न जलूँ तुम हसीं थे,  बड़े ही प्यारे थे सोच कर आह भरूँ या न भरूँ इक ग़ज़ल तुमपे मुझे कहनी है सोचता  हूँ कि  कहूँ या न कहूँ प्यार के पंख लगा कर ओ सनम चाँद के  पार चलूँ   या न चलूँ तुझको पाकर जो मैंने खोया है बैठ कर  हाथ मलूँ  या न मलूँ ग़म है तेरा तो मेरे दिल को बहुत रुख़-ए-मयख़ाना करूँ या न करूँ ये भी इक जहदे-मुसलसल है 'जहद' मैं सुख़नकार  बनूँ   या न बनूँ ??              #जावेेद_जहद

इक हसीं से प्यार का तुम ख़ुशनुमा एहसास हो..

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         ताज़ा ग़ज़ल इक हसीं से प्यार का तुम ख़ुशनुमा एहसास हो दूर होकर भी सनम तुम  कितने  मेरे  पास  हो कैसे फिर रस्ता न देखूँ  मैं तुम्हारा हर घड़ी आज तक टूटी नहीं जो तुम मिरी वो आस हो आज भी तन्हाई में तुम ख़्यालों,ख़्वाबों में कभी प्यार का नग़्मा लिए आ जाया  करते पास हो !! आज तक दुनिया में मैं तो ज़िंदा हूँ बस इस लिए मुझमें चलती रहती है जो, तुम ही तो वो सांस हो देख कर तुमको सनम हो जाती है तबियत हरी मेरी प्यासी ज़िंदगी की इक तुम्हीं तो प्यास हो ! कैसे मैं ये मान लूँ तुम हो सनम मुझसे अलग मैं जो हूँ इक गुल अगर तो तुम मिरी बू-बास हो क्या है मेरा हाल तेरे बिन सनम मैं क्या कहूँ ख़ुद ही तुम ये जान लो, ख़ुद ही तो तुम हस्सास हो काम कोई क्या करेगा वो बड़ा जग में 'जहद' कुछ न कर पाएगा, जिसको ख़ुद पे न विश्वास हो              जावेेद जहद

जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है..

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       ताज़ा ग़ज़ल जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है और मुझे उसकी तो आदत पे हँसी आती है वो न मिलते हैं, न मिलने ही हमें देते हैं उनकी इस गंदी सियासत पे हँसी आती है शादमानी में कभी रोना बहुत आता है और कभी दर्द-मुसीबत पे हँसी आती है यूँ भी होता है कभी ज़िंदगी की राहों में रोना आता है न क़िस्मत पे हँसी आती है उससे हो जाती है थोड़ी सी कमाई उसकी इसलिए उसको तो मय्यत पे हँसी आती है तू तो सबकुछ ही बहुत उम्दा हसीं चाहे है ऐ मिरे दिल, तिरी हसरत पे हसीं आती है माहिर-ए-फ़न से भी लग़ज़िश कभी हो जाती है ये भी क़ुदरत है तो क़ुदरत पे हँसी आती है !! झूट का सपने में भी कुछ न बनाओ यारो झूट की सारी इमारत पे हँसी आती है !! जो मिले जुर्म, गुनाहों के 'जहद' बदले में ऐसी तो इज़्ज़त-ओ-शोहरत पे हँसी आती है           जावेेद जहद

गीत-संगीत, जाम-ओ-अदा, चाँदनी..

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        #ताज़ा_ग़ज़ल 💐 गीत-संगीत, जाम-ओ-अदा, चाँदनी कुछ सुना, कुछ पिला, कुछ दिखा चाँदनी मैं भी आंगन से तुझको निहारा करूँ तू भी छत से तो मुझको लुभा चाँदनी तेज़, मद्धम कभी गुमशुदा-गुमशुदा क्या है तेरा भी ये फ़लसफ़ा चाँदनी छूना चाहूँ जो मैं छू न पाऊं तुझे तू भी है इक अजब दिलरुबा चाँदनी रात आई है काली, छुपा चाँद भी तू भी जा, पास उसके तू जा चाँदनी दर्द-ओ-ग़म की तड़प, हिज्र की बेबसी सामने से मिरे अब हटा चाँदनी !! मैं न आऊँगा अब तो तिरे जाल में दिल है तुझसे बहुत छक चुका चाँदनी चाँद उसका था, वो ले गया ठीक है मेरे दिल की वो क्यों ले गया चाँदनी तू कभी थी मिरी ज़िंदगी अब मगर तेरी फ़ुर्क़त में दम घुट गया चाँदनी मैं दिवाना तिरा, तू दिवानी मिरी फिर 'जहद' क्या यहाँ कर रहा चाँदनी            जावेेद जहद सहसरामी

रह-रह के मय छलकती रही कोई रात भर..

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       ताज़ा ग़ज़ल रह-रह के मय छलकती रही कोई रात भर पी-पी के शय बहकती रही कोई रात भर ! देती रही हवा किसी जज़्बात को फ़िज़ा इक आग सी भड़कती रही कोई रात भर मज़बूत थी गिरफ़्त मगर जाने क्या हुआ होंठों से लय सरकती रही कोई रात भर इतनी सियाह रात थी उस काली रात की ख़ुद में नज़र भटकती रही कोई रात भर शबनम की बूंद गिरती रही उसके जिस्म पर खिलके कली महकती रही कोई रात भर !! न जाने कैसा था नशा उस रात में 'जहद' गिरके पलक संभलती रही कोई रात भर             जावेेद जहद