सहते-सहते दर्द-ए-दिल तो इक ज़माना हो गया..

          ताज़ा ग़ज़ल

सहते-सहते दर्द-ए-दिल तो इक ज़माना हो गया
लगता है अब ग़म ही अपना आशियाना हो गया

शाम तक ये दिल सुबह से मुस्कुराता ही रहा
होते ही शब जाने क्यों गुम मुस्कुराना हो गया

पहले तो ये इश्क़ अपना, अपने तक ही था मगर
रफ़्ता-रफ़्ता क़िस्सा ये भी आलमाना हो गया !!

उनके जाने का तो कोई रास्ता छोड़ा न था
एक खिड़की थी खुली, बस ये बहाना हो गया

दुनिया ने हर वक़्त इसको इतना ज़्यादा दुख दिया
सीधा-साधा, भोला-भाला दिल सयाना हो गया !!

हाए बे-फ़िक्री थी कितनी मेरे अंदर कल तलक
कैसे लेकिन दिल मिरा भी शायराना हो गया !!

जाने कब से ख़ुद को शायर हम बनाते ही रहे
आख़िर अपना रूप भी अब शायराना हो गया

बे-वज़न हम हो गए या वक़्त हम पे आ चढ़ा
कैसा अपना भी 'जहद' रुतबा निशाना हो गया

      ~ जावेद जहद

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