बाहर में जो दिल बहलाए..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐

बाहर में जो दिल बहलाए
घर में वो ख़ुद ही आग लगाए

अपनों को जो भी ठुकराए
ग़ैरों की वो ठोकर खाए !!

धन के नशे में न इतराए
कौन भला जग को समझाए

हर दामन पे दाग़ है मैला
सोच के कोई उंगली उठाए

ज़ुल्म-ओ-सितम का, जौर-ओ-जफ़ा का
दुनिया कब तक बोझ उठाए !!

उनकी याद बहुत आती है
सावन की रुत जब-जब आए

लोग तरक़्क़ी कर गए लेकिन
दिल में वही है हाए-हाए !!

अपनी-अपनी सबको पड़ी है
कौन किसे ख़ातिर में लाए !!

झूठा वादा करते-करते
क्या से क्या है वो बन जाए

मिट गई लाज 'जेहद' जी देखो
दुल्हन भी अब न शर्माए !!

     ~ जावेद जहद

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