आज का डूबा कल निकले गा..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 आज का डूबा कल निकले गा सूरज फिर से चल निकले गा होगी फिर से मिल्लत हम में नफ़रत का फिर बल निकले गा आज उसे फिर देखा गुमसुम दिल का दर्द उबल निकले गा मेरा सीना चीर के देखो दिल ये गाते ग़ज़ल निकले गा कुछ नदी में कीचड़ रहने दो इसमें ही तो कँवल निकले गा पौधा जो भी धूप न झेले पेड़ वो कैसे सबल निकले गा चोरी करके, रिशवत देके क्या होगा जो फल निकले गा झूठे वादे करता है जो उसका प्यार तो छल निकले गा एक अकेले दम से कैसे दुनिया भर का हल निकले गा बुरा-बुरा जब काम हो, कैसे अच्छा कोई फल निकले गा ये ज़बाँ हमेशा फिसली 'जेहद' अब क्या ख़ाक सँभल निकले गा ~ जावेद जहद