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देखो तो ज़र्रे-ज़र्रे पे कितना शबाब है..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 देखो तो ज़र्रे-ज़र्रे पे कितना शबाब है कहता है कौन ये कि ज़माना ख़राब है अच्छा ये दिन है आया या आया ख़राब है देखो जिधर भी होता उधर इंक़लाब है !! परदे में छुप के रहती थी जो कितनी लाज से चारों तरफ़ ही शै वही अब बेनक़ाब है !! किसने ये साज़ छेड़ दिया मस्त-मस्त सा देखो जिधर भी रक़्स में हुस्न-ओ-शबाब है नफ़रत की आग फैली है माना कि हर तरफ़ उल्फ़त के दीप की भी अभी कम न ताब है कुछ न कहूंगा और न इशारा करूंगा मैं समझो कि हाथ में मिरे ये क्यों गुलाब है कितनों पे चढ़ गई ये, चढ़ाई गई कहीं अब ये अना की भेंट भी चढ़ती शराब है करते हो बात-बात पे बेकार की बहस ऐसी बहस से होने लगा इज़्तिराब है ! कितने सवाल हो गए हल फिर भी तो मगर दुनिया में अब भी कितना अधूरा जवाब है कैसे मैं मान लूँ कि बहुत मुफ़्लिसी है अब छप्पर जहाँ था आज वहाँ छत जनाब है थोड़ा-बहुत ख़राब तो होता है हर कोई उसका न साथ दो जो सरासर ख़राब है फ़ैशन का दौर है ये 'जहद' कितना शानदार सूरत बुरो भी अब तो लगे माहताब है ।।           ~जावेद जहद