एक ही ज़मीन में तीन ग़ज़लें..

      1_ग़ज़ल

ज़िंदगी में है इंतिशार बहुत
मिलेगा कैसे फिर क़रार बहुत

जाने कैसे ये आ गई ख़ुश्की
फल वफ़ा के थे आबदार बहुत

हमें तो आपसे है बैर नहीं
आप ही को मगर है खार बहुत

दिल, जिगर, रूह तक असर इसका
इस क़लम की है तेज़ धार बहुत !!

मौज ग़ज़लों की भाई क्या कहना
इस नदी के हैं आबशार बहुत !!

क्या पता उसको मेरा है कितना
है मुझे जिसका इंतज़ार बहुत !!

इन दिनों कोई मुझसे रूठा है
इन दिनों हूँ मैं सोगवार बहुत

मेहनती लोगों के लिए जग में
हर जगह ही हैं रोज़गार बहुत

उसकी पिक्चर में बस तशद्दुद था
कर गई कैसे कारोबार बहुत ??

मैं जलाऊंगा क्या तुम्हें जानम
तुम तो ख़ुद ही हो शोलाबार बहुत

शायरी अपनी भी लो मश्क़ी से
बन गई देखो पायदार बहुत !!

बन न पाए जो दिन हसीन 'जहद'
तो शब-ए-ग़म को ही सँवार बहुत
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     2_ग़ज़ल

जब जहाँ में भरा था प्यार बहुत
वो ज़माना था शानदार बहुत !!

अब तो गिनती के रह गए जैसे
अबसे पहले थे बा-वक़ार बहुत

अब के ऐसी घटी हैं घटनाएं
अब के दुनिया है शर्मसार बहुत

जब हमारी थी ज़िंदगी फ़ितरी
तब हक़ीक़त में था क़रार बहुत

वो जिसे चाहे ख़ाक कर डाले
उसका जलवा है शोलाबार बहुत

पश्चिमी धुन के सब हुए रसिया
सब थिरकते हैं अब तो यार बहुत

कोई दुनिया हो दिल की आँखों से
हमने देखा है आर-पार बहुत !!

क्या पता लब से क्या निकल जाए
छेड़ो न दिल को मेरे यार बहुत !!

क्या है करना कोई भी ग़म ज़्यादा
क्या है रहना भी अश्कबार बहुत

क्या है मरना ये नाम, शोहरत पर
मिट गए कितने नामदार बहुत !!

मुझको मरने दे ख़ुद पे या जानम
हो जा मुझपे तू ही निसार बहुत !

रास्ते ऐसे कुछ हैं जिनमें 'जहद'
धूप, पत्थर हैं और ख़ार बहुत !

चाहे सारा जहाँ बिखर जाए
चाहिए उनको इक़तिदार बहुत

कार्यकर्ता हैं ये कि ग़ुंडे हैं
ये मचाते हैं ख़लफ़िशार बहुत

अब ये जैसा भी है ज़माना 'जहद'
है क़सम से ये नव-बहार बहुत !!
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3_ग़ज़ल

मुफ़लिसी में भी है क़रार बहुत
न हो दिल में जो ख़लफ़िशार बहुत

कभी जन्नत सी दिखती है दुनिया
और कभी लगती है बेकार बहुत

इक तरफ़ क़ैद-ओ-बंदिशें कितनी
इक तरफ़ दुनिया-ए-फ़रार बहुत !

सब अधूरे हैं एक दूजे के बिन
सबका सबपे है इंहिसार बहुत

कम ही देते हैं साथ संकट में
और ख़ुशी के हैं हिस्सेदार बहुत

मिल न पाए जो उनकी मंज़ूरी
तो करे कैसे कोई प्यार बहुत !

उस क़लमकार का भी क्या कहना
जिसकी हर शय हो शाहकार बहुत

दिल हुआ मेरा अब तुम्हारा दिल
अब करो मेरे दिल पे वार बहुत !

अब मैं खोया हूँ और ही धुन में
अब सनम मुझको न पुकार बहुत

उस शहर का भी यारो क्या कहना
जिस शहर में हों रचनाकार बहुत !

अब ये जैसा भी है हमारा वतन
है क़सम से ये नव-बहार बहुत !

इतनी तालीम पर भी दुनिया 'जहद'
हो गई कैसे फिर गँवार बहुत ??
                #जावेेद_जहद

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