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विष जो फैला जा रहा है आजकल..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 विष जो फैला जा रहा है आजकल सारे जग को  खा रहा है आजकल ख़्वाब में भी जो कभी देखा नहीं वो समाँ दिखला रहा है आजकल जाने कब अच्छा ज़माना आएगा दिन बुरा ही आ रहा है आजकल सारी दुनिया दहशतों में जी रही कोई न इतरा रहा है आजकल लड़ रहे हैं जंग सब अब देखना किसमें दम कितना रहा है आजकल जग की सारी ख़ामी और नाकामी से पर्दा उठता जा रहा है आजकल !! पास किसके पैसा है, किसके नहीं कैसे कोई खा रहा है आजकल !! इतनी लम्बी बंदियों में जो मिला काफ़ी वो सब क्या रहा है आजकल सारा जग न जाने किस अपराध की ये सज़ाएं पा रहा है आजकल !! सीख लो ऐ दुनिया वालो सीख लो कुछ सबक़ सिखला रहा है आजकल बदनुमा ये कैसा चेहरा दुनिया का सबको ही दिखला रहा है आजकल आगे देखो क्या यहाँ बदले 'जेहद' करवटें जग खा रहा है आजकल       ~जावेद जहद

अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा क्या कहें पहले सा वो वतन ना रहा ।। अब शहर-गांव और ना किसी सम्त भी सच तो ये है वफ़ा का चलन ना रहा ।। हिंदू-मुस्लिम हों ईसाई या कोई भी अब किसी में भी वो अपनापन ना रहा दिल गुनहगार हैं, चेहरे मक्कार हैं जिस्म पर भी वो अब पैरहन ना रहा घर के बटवारे में दिल भी बट-बट गए इसलिए ही तो हो अब मिलन ना रहा  कितने रंगों का मेला लगा है 'जहद' हाँ मगर रंग-ए-गंग-ओ-जमन ना रहा        ~जावेद जहद