जावेद जहद की पाँच ग़ज़लें..
1..ग़ज़ल 💐 मोहब्बत तो होती है इक रात की शुरू फिर घड़ी इख़्तिलाफ़ात की वो पाकीज़गी अब कहाँ इश्क़ में ये शै बन गई है ख़ुराफ़ात की !! थी पहले तो शाम-ओ-सहर ही की फ़िक्र मगर अब तो उलझन है दिन-रात की !! अजब सरफिरा आदमी वो भी है लड़ाई वो करता है बे-बात की !! हैं उनके बिना क्या बहारों के दिन लगे रुत भी फीकी सी बरसात की वो जब सामने थे तो था जोश भी उठे लह्र अब कैसे जज़्बात की ? कही ख़ूब हमने ये ग़ज़लें तो क्या करिश्मे किए या करामात की !! ग़ज़ल में बहुत ही है जादू भरा करो बात इसके तिलिस्मात की ग़ज़ल से है मुझको तो उल्फ़त 'जहद' करो बात मुझसे ग़ज़लयात की !! **************************** 2..ग़ज़ल 💐 गुलाब अच्छे भी लगते हैं गुलसितां से कहाँ यहाँ खिले हैं तो जाएंगे हम यहां से कहाँ यहाँ भी दर्द-मुसीबत, वहाँ भी स्वर्ग-नरक फ़रार मिलता है ये दे भी देने जां से कहाँ ये अस्र-ए-नव का चलन, तौबा माफ़ हो बाबा बिछड़ के आ गए हम तेरे कारवां से कहाँ !! ज़मीन, चाँद, फ़लक का सफ़र भी कर डाला अब और आगे भी हम जाएं आसमां से कहाँ हर एक मुल्क दिखाता है ताक़तें अपनी किसी को ग़र्ज़ भी है अम्न और अमां से कहाँ तमाम...