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Showing posts from April, 2021

थिरकते रहते हैं हरदम मटकते रहते हैं..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐 थिरकते रहते हैं हरदम, मटकते रहते हैं ये इतना आप सनम क्यों सनकते रहते हैं तुम्हारे अंग में क्य ऐसा है भरा जानाँ ये अंग क्यों तिरे इतने लचकते रहते हैं उलझ गया है कोई क्या हसीन ज़ुल्फ़ों में ये इतना आप इसे क्यों झटकते रहते हैं समझ में आती नहीं आपकी कोई हरकत हमेशा आप तो मुझको खटकते रहते हैं ! चमक बनावटी नग-मोती की है मिट जाती कि असली हीरे तो हरदम चमकते रहते हैं जिधर है जाना, उधर को नहीं पहुंचते जो तमाम उम्र. वो यूँ ही.भटकते रहते हैं !! बला की चीज़ हैं ये शेर भी सुनो.यारो दुरुस्त लाख हों फिर भी खटकते रहते हैं शराब हद से ज़्यादा जो पीते रहते हैं बहुत बुरे वो शराबी महकते रहते हैं न जाने कब मिरा भी शेर कोई चमकेगा किसी-किसी के तो कितने दमकते रहते हैं 'जेहद' बुलंदियों की फ़िक्र तुम किया न करो वहाँ पहुंच के भी कितने सरकते रहते हैं !!          ~जावेद जहद

जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं कभी-कभी वही बेहद  रुलाया करते हैं !! है जिनपे फ़र्ज़ हमें हर तरह से ख़ुश रखना तरह-तरह से वही क्यूँ  सताया करते हैं ? जो रूठ जाएं उन्हें छोड़ो मत कभी यूँँ ही ख़फ़ा जो रहते है उनको मनाया करते हैं उठा दो ऐसी शपथ जिसका एहतिराम नहीं रखो वही जिसे सारे  निभाया करते हैं !! हम उनकी क़द्र करें कैसे दोस्तो बोलो जो अपना भार-वज़न ख़ुद गिराया करते हैं ये ज़ात-पात, फ़सादात, छल को मौत आए उन्हें भी आग लगे जो सिखाया करते हैं !! जो जानते नहीं, वो क्या दिखाएं बेचारे जो जानते हैं, हुनर वो दिखाया करते हैं ये बार-बार 'जेहद' मौक़ा उनको क्या देना निकम्मे हों जो उन्हें तो हटाया करते हैं !!        ~जावेद जहद

या ख़ुदा, कैसी ये बला आई..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 या ख़ुदा, कैसी ये बला आई हर तरफ़ मौत बनके है छाई घिर गईं कैसे ये अँधेरों में सारी दुनिया की सारी रानाई हर तरफ़ दर्द-ओ-ग़म है, मातम है ढोल बजता कहीं न शहनाई !! क्या पता क्या ख़ता हुई हमसे कैसे जुर्मों की है सज़ा पाई !! अब हवा भी भली नहीं लगती कैसी पछिया रे कैसी पुरवाई चल रहा था बहुत दिनों से खेल शक्ति से शक्ति अब है टकराई ! हम वफ़ा ख़ुद ही उससे कर न सके क्या हुआ, वो हुआ जो हरजाई !! मैं तो उस्ताद ख़ुद को कहता नहीं लोग समझें तो क्या करूँ भाई !! आपदा है बहुत बड़ी ये 'जहद' मिलके इमदाद सब करो भाई         ~जावेद जहद

अब गो कोरोना, तू गो कोरोना..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 अब गो कोरोना, तू गो कोरोना मौत की नींद  जा सो  कोरोना मर-बिला जा तू ऐसे सब बोलें अब किसी और भी नो कोरोना अबके आके तो मार डाला हमें अब कभी ऐसा  न हो कोरोना ता-क़यामत तिरा पता न चले जा तू ऐसे  कहीं खो कोरोना सारे जग को  हिला दिया तूने कितनी घातक बला हो कोरोना इस मुसीबत में तू हमारे बीच बीज नफ़रत के न बो कोरोना इक ख़ुदाई क़हर या अपनी ख़ता कुछ तो बोलो रे क्या हो कोरोना हम तिरा नाम तक मिटा देंगे हमसे पंगा  लिया जो कोरोना रैलियाँ  ख़ूब की  'जहद' तूने अब तू ले इस क़दर ढो कोरोना       ~जावेद जहद

कम न हुए हैं कुछ भी तो दर्द-ओ-अलम अभी..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 कम न हुए हैं कुछ भी तो दर्द-ओ-अलम अभी जग में भरे हुए हैं जी  ज़ुल्म-ओ-सितम अभी महफ़िल से, भीड़-भाड़ से सब दूर ही रहें ये वायरस तो कर रहा बिस्फोट बम अभी बढ़ती ही जा रही हैं हमारी मुसीबतें शायद रहेगा जारी ख़ुदा का सितम अभी कितने मज़े से घर में पड़े करते प्यार हम लेकिन न जाने है कहाँ मेरा सनम अभी समझेगा किस तरह वो कि होता है प्यार क्या रक्खा है राह-ए-इश्क़ में उसने क़दम अभी !! हम पे किया है तूने बहुत ही करम मगर हम पे ख़ुदाया और हो रहमो-करम अभी अपनी तो यारो कुछ भी नहीं हैं ये शोहरतें लाखों निसार होंगे ख़ुदा की क़सम अभी ! छोड़ो सियासतें न लड़ो इस घड़ी 'जेहद' सबको बचाने में ही लगाना है दम अभी          ~जावेद जहद

शराब पीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे..

           ताज़ा ग़ज़ल 💐 शराब पीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे नशे में जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे ज़माने भर की ये चोट खाके, जहाँ के ग़म को गले लगा के ये ऐसे जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे दो-चार दिन की ये ज़िंदगी में, दो-चार ख़ुशियों की चाहतों में यूँ मरते-जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे न दुनिया से है तुम्हें मोहब्बत, न करते हो तुम किसी की ख़िदमत यहाँ पे जीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे तुम्हीं तो हो वर्तमान यारो, भविष्य भी हो तुम्हीं तो बंधू समय भी बीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे किसी से रिश्ता बना लिया तो, 'जेहद' उसी से जुड़े हो रहते यूँ सख़्त फ़ीते हो किस लिए तुम, किसी ने पूछा तो क्या कहोगे           ~जावेद जहद

शिकस्ता दिल और मगन में है जी..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 शिकस्ता दिल और मगन में है जी ये कैसा दिल इस बदन में  है  जी लपकता उनपे ये दिल कभी था अब अपनी ही ये शरण में  है जी उन्हें है पाना बस एक धुन थी ये दिल कईं अब लगन में है जी हैं जाँद कितने तो कैसे कह दूँ कि चाँद बस इक गगन में है जी वो कैसा है जो लुटा के सबकुछ क़रार-ओ-चैन-ओ-अमन में है जी किसी भी शायर की कामयाबी बस उसके मश्क़-ए-सुख़न में है जी ये कैसा उड़ने का शौक़ जागा हर एक पंछी गगन में है जी ! उसे न तुम दो नज़र से देखो जो अपने ही इस वतन में है जी किसी भी तहज़ीब मेंं न होगी जो बात गंग-ओ-जमन में है जी 'जेहद' न जानो सहल इसे तुम बड़ा परिश्रम सुख़न में है जी ।      ~जावेद जेहद

मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है यानी तू आज भी बसी मेरी नज़र में है छूकर इन्हें भी जैसे छू लेता हूँ मैं तुझे तेरा ही लम्स तो मिरे दीवार-ओ-दर में है तू ही बता कि बिन तिरे इन सब का क्या करूँ दिल में जो जुनूँ मिरे, सौदा जो सर में है !! तेरे बिना भी मैं तो मगन रहता हूँ सनम तुम सा ही लुत्फ़ ये तिरे ख़्याल-ए-सेहर में है हुस्न-ओ-जमाल की तिरे तारीफ़ क्या करूँ तू आसमां के इन हसीं शम्स-ओ-क़मर में है मेरी कला में कुछ तो बला का जमाल है और कुछ कमाल आपके हुस्न-ए-नज़र में है अम्न-ओ-अमान, प्यार-वफ़ा की क़दर करो ये शै बड़े ही क़ीमती लाल-ओ-गुहर में है !! कोई भी काम हो तो समझदारियों से हो होता बड़ा अनर्थ ज़रा सी कसर में है !! कहती है दुनिया मेरा हर इक शेर देख के ये तो 'जेहद' सुख़न के बड़े जादूगर में है        ~जावेद जहद

किसी का प्यार कभी देखा यूँ गहरा तो नहीं..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 किसी का प्यार कभी देखा यूँ गहरा तो नहीं कहीं ये दोनों वही मजनूँ-ओ-लैला  तो  नहीं सता के तुम मुझे क्यों चाहते हो हमदर्दी  कहीं ये पड़ गया जानम तुम्हें मँहगा तो नहीं जहाँ भी देखिए फैली हुई है उर्यानी नहीं थी ऐसी, कोई और ये दुनिया तो नहीं फिर नज़र प्यार से वो मुझसे मिलाने है लगा वो मुझे देगा कहीं फिर वही धोखा तो नहीं हम सुना देते हैं अक्सर सभी को ग़म अपना किसी से जबकि हमें चाहिए कहना तो नहीं हुक्म सब उनका बताओ भला मैं क्यों मानूँ उसने चाहा है मुझे, मुझको ख़रीदा तो नहीं बला जो सामने होती उसे भी पढ़ न सके जहाँ ये होने लगा है कहीं अंधा तो नहीं जहाँ का.ज़्यादा ज़यां आप ही तो करते हैं खुला ये सच है, कोई झूठ का दुखड़ा तो नहीं चला ये आया ज़माना कहो अब कैसा मियाँ बुरा या अच्छा, रहा अब कोई पर्दा तो नहीं सज़ा वो देता है अक्सर ग़मों के मारों को मिरे वो शह्र का मुंसिफ़ कहीं अंधा तो नहीं मिरी भी शायरी गूंजेगी 'जेहद' दुनिया में ये मैं भी.देख रहा हूँ कोई सपना तो नहीं          ~जावेद जहद

गुलशन है, पेड़-पौधे, कली-गुल, बहार है..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 गुलशन है, पेड़-पौधे, कली-गुल, बहार है उसमें ही एक ख़ित्ता  बड़ा ख़ारदार है !! वैसे तो उसका होता बड़ों में शुमार है लेकिन वो आदमी तो बड़ा ख़ाकसार है किस काम की भला वो बड़ी ऐसी शख़्सियत जिसको दबाए रक्खे घिनौना हिसार है !! करना है गर जफ़ाएं तो दुश्मन से अपने कर उस से न कर जफ़ा तू जो तुझपे निसार है !! लगने लगी है आग 'जेहद' चारों ही तरफ़ इस बार किस तरह की ये आई बहार है ! नाहक़ ही कितने मरते हैं दंगे-फ़साद में पर छोड़ो, इससे कौन यहाँ शर्मसार है ! कैसे करेगा सारे ज़माने का वो इलाज मुद्दत से जिस बशर का ज़ेहन ख़ुद बिमार है कितनी ही बार कर चुका है हमसे तू फ़रेब कैसे मैं मान लूँ कि तिरा सच्चा प्यार है !! बर्बाद करके रख दिया उसने तुझे 'जहद' अब और किस बला का तुझे इंतेज़ार है          ~जावेद जहद

कुछ तो ये अपनी मुश्किलें आसान कर चलो..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 कुछ तो ये अपनी मुश्किलें आसान कर चलो मेरा भी तुम  कहा तो कभी   मान कर चलो  मरने के बाद ख़ाक में मिल जाएगा बदन ये सोच कर इसे किसी को दान कर चलो यूँ ही तो जान देने से अच्छा है ख़ुद को तुम अच्छे से कोई काम में क़ुर्बान कर चलो !! दुनिया में कुछ भी पाना तो यारो कठिन नहीं बस अज़्म दिल में अपने ज़रा ठान कर चलो ख़ामोश ज़ुल्म सहने से अच्छा है दोस्तो उसके ख़िलाफ़ जंग का एलान कर चलो झगड़ा, लड़ाई, जंग, तशद्दुद, ख़ूँ-रेज़ियाँ ऐसे हर एक रोग का नीदान कर चलो ! अच्छे-बुरे की तुमको तो है यारो ख़ुद समझ अच्छे-बुरे को ख़ुद से ही पहचान कर चलो जुर्म-ओ-गुनाह करते हो तुम तो बड़े-बड़े तुमको ये हक़ नहीं कि जिगर तान कर चलो अच्छा-बुरा किसी को सुनाने से पहले तुम अपनी भी ख़ामियों पे ज़रा ध्यान कर चलो कितनी ही उलझनों में 'जेहद' घिर चुके हो तुम अब तो सहीह रास्ता पहचान कर चलो !!        ~जावेद जहद

इन दिनों क्या है बात कांटों की..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 इन दिनों क्या है बात कांटोंं की हर तरफ़   है बरात कांटों की चुभते रहते हैं और क्या करते बस यही तो सिफ़ात कांटों की पहले फूलों की थी मगर अब तो सुब्ह कांटों की, रात कांटों की क्या पता कब किसे ये चुभ जाएं कौन जाने है घात कांटों की !! उनका सारा कलाम. ज़हरीला उनकी सारी ही बात कांटों की जितना करना था कर लिया आफ़त हो रही अब तो मात कांटों की ।। है ये तेरा तो ऐसा रूप 'जेहद' जैसे फूलों में ज़ात कांटों की      ~जावेद जेहद

देखो तो ज़र्रे-ज़र्रे पे कितना शबाब है..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 देखो तो ज़र्रे-ज़र्रे पे कितना शबाब है कहता है कौन ये कि ज़माना ख़राब है अच्छा ये दिन है आया या आया ख़राब है देखो जिधर भी होता उधर इंक़लाब है !! परदे में छुप के रहती थी जो कितनी लाज से चारों तरफ़ ही शै वही अब बेनक़ाब है !! किसने ये साज़ छेड़ दिया मस्त-मस्त सा देखो जिधर भी रक़्स में हुस्न-ओ-शबाब है नफ़रत की आग फैली है माना कि हर तरफ़ उल्फ़त के दीप की भी अभी कम न ताब है कुछ न कहूंगा और न इशारा करूंगा मैं समझो कि हाथ में मिरे ये क्यों गुलाब है कितनों पे चढ़ गई ये, चढ़ाई गई कहीं अब ये अना की भेंट भी चढ़ती शराब है करते हो बात-बात पे बेकार की बहस ऐसी बहस से होने लगा इज़्तिराब है ! कितने सवाल हो गए हल फिर भी तो मगर दुनिया में अब भी कितना अधूरा जवाब है कैसे मैं मान लूँ कि बहुत मुफ़्लिसी है अब छप्पर जहाँ था आज वहाँ छत जनाब है थोड़ा-बहुत ख़राब तो होता है हर कोई उसका न साथ दो जो सरासर ख़राब है फ़ैशन का दौर है ये 'जहद' कितना शानदार सूरत बुरो भी अब तो लगे माहताब है ।।           ~जावेद जहद

कुछ हसरतें निकल गईं, कुछ बाक़ी हैं अभी..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 कुछ हसरतें नकल गईं, कुछ बाक़ी हैं अभी यानी ज़मीनें दिल की मिरे  प्यासी  हैं  अभी इतने सितम पे तो चली आतीं क़यामतें शायद ख़ुदा की रहमतें कुछ बाक़ी हैं अभी जब इल्म से सँवरती है ये ज़िंदगी तो फिर क्यों शम्मएं बुझी-बुझी रूहानी हैं अभी ? अपने लहू से सींचने वाले ये बाग़ को इक दो नहीं करोड़ों ही तो माली हैं अभी ऐ पंछियों उड़ाने ज़रा भरना सोच के झोंके हवाओं के बड़े तूफ़ानी हैं अभी जलवा हसीं दिखा के यूं भागा न कीजिए ऐ जान-ए-जाँ, निगाहें मिरी प्यासी हैं अभी ऐ दिल उचट गया है तू इतना जहाँ से क्यूँ सुब्हें हसीन, शामें भी मस्तानी हैं अभी !! वो हमसे कब थे बिछड़े मगर लगता है 'जहद' हम सब के बीच 'मीर', 'जिगर', 'हाली' हैं अभी       ~जावेद जहद

ये सारे जग से ख़ुशनुमा, ये सारे जग से शादमाँ..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 ये सारे जग से ख़ुशनुमा, ये सारे जग से शादमाँ ये हर तरह के फूलों का हसीं-हसीं है गुलसिताँ यहाँ की दिलकशी अलग, फ़ज़ा अलग, समाँ अलग ये अपने ही तो रंग में भला लगे है हाँ जी हाँ ।। बहुत ही दूर-दूर से यहाँ पे आते लोग हैं कि जैसे आते पंछियाँ, यहाँ पे करने मस्तियाँ ये देवी, देवताओं की पसंद की जगह रही हैं कितने ख़ुशनसीब हम कि पैदा हम हुए यहाँ हमें ये जब अज़ीज़ है, हमारी जब ये जान है तो लूटो न इसे कभी, लुटाओ बल्कि इसपे जाँ हो बात करते अम्न की, वतनपरस्तियों की तुम तो बेहयाई से करो न गंदी राजनीतियाँ ।। हमीं उजाड़ें गर इसे, बुरी ये कितनी बात है हमीं तो हैं सुहाने से ये गुलसितां के बाग़बाँ यहाँ कहीं हवाएँ हैं कि जितनी साफ़-सुथरी सी यहाँ, वहाँ भी वैसी हो, जहाँ भरा है बस धुआं ख़ुदा तिरा है लाख-लाख शुक्रिया हाँ शुक्रिया रहा है जैसे इसपे तू , हमेशा रहना मेहरबां !! हक़ीक़तों से तर ब तर यहाँ के सारे फ़न 'जहद' हाँ सारी ही कलाओं का ये क़ुदरती है आशियाँ          ~जावेद जहद

कहाँ से आ गई ये ज़िंदगी में बेचैनी..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 कहाँ से आ गई ये ज़िंदगी में बेचैनी दिखाई देती है अब हर किसी में बेचैनी दिलों में चैन-ओ-सुकूँ भरदे मेरे या अल्लाह वगरना होगी तिरी बंदगी में बेचैनी ।। सुकून-ओ-चैन, मुसर्रत, ख़ुमार, मदहोशी ये अच्छी होती है या शायरी में बेचैनी ? क़सम से देखी नहीं इतनी तो कभी मैंने बढ़ी है जितनी सियासतगरी में बेचैनी । हमारी एकता चैन-ओ-सुकून देती है कभी न आए कोई इस गली में बेचैनी जुदा वो होके मिरा चैन ले गए आख़िर यहाँ भी आ गई लो आशिक़ी में बेचैनी जहाँ नहीं थी वहाँ भी ये आज आ पहुंची हर इक की बात में, आंसू, हँसी में बेचैनी ज़रा सी ठीक है लेकिन 'जहद' बहुत ज़्यादा कभी न आए किसी ज़िंदगी में बेचैनी !!          ~जावेद जहद

मोहब्बत में ऐसा दिवाना हुआ दिल..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 मोहब्बत में ऐसा दिवाना हुआ दिल कि मुझसे ही मेरा बेगाना हुआ दिल ये देखे है सपना सुहाना - सुहाना चलो अब मिरा भी सुहाना हुआ दिल मोहब्बत भरा गीत है गाता फिरता बहुत आजकल आशिक़ाना हुआ दिल मोहब्बत में करने लगा शायरी भी छबीला बड़ा शायराना हुआ दिल बड़ी क़ातलाना निगाहें हैं उसकी है जिसकी नज़र का निशाना हुआ दिल जुदाई, तड़प, रतजगे, बेक़रारी इन्हीं का तो अब ये ठिकाना हुआ दिल गया था मुझे छोड़ के पास उनके तो फिर क्यों तिरा लौट आना हुआ दिल ख़यालों में उनके तू बेसुध पड़ा है तू है ख़ैर से या रवाना हुआ दिल कब आती थी इसको मोहब्बत समझ में लगी चोट तब ये सियाना हुआ दिल ।। बहुत रोज़ से ये जमा करते - करते 'जेहद' प्यार का ये ख़ज़ाना हुआ दिल        ~जावेद जहद

किसी अपने से या पराए से, कभी भी किसी से तू प्यार कर..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 किसी अपने से या पराए से, कभी भी किसी से तू प्यार कर तो बड़े ही जोश-ओ-ख़रोश से, बड़ी ख़ुशदिली से तू प्यार कर किसी को समझ ज़रा न बुरा, सभी को तू अच्छी नज़र से देख है बड़ी ही अच्छी ये बंदगी, ये भी बंदगी से तू प्यार कर ।। बुरा क्या है प्यार निभाने में, बुरा क्या है नेकी कमाने में हैं ख़ुदा की जितनी भी ख़ल्क़तें, सभी से सभी से तू प्यार कर तिरे पास जो भी अज़ीज़ हैं, उन्हें चाहे जितना तू प्यार दे हैं जो दूर रहते इधर-उधर, उन्हें भी सही से तू प्यार कर । तू अँधेरों का भी पुजारी है, तू उजालों का भी पुजारी है ये तो पाप है, तू अँधेरों से या तो रौशनी से तू प्यार कर मैं बना-बना के लुटाऊँगा कई शेर रोज़ ज़माने में मुझे दे न दे कोई अहमियत, मिरी शायरी से तू प्यार कर ज़रा ग़ज़लों में रहे नग़मगी, रहे लय बनी सभी शेर की सभी गाते भी हैं इसे 'जेहद', फ़न-ए-मौसिक़ी से तू प्यार कर            ~जावेद जहद

जुदाई में उनकी मज़ा और भी है..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 जुदाई में उनकी मज़ा और भी है ये दिल उनपे होता फ़िदा और भी है वो जाते हैं जितना अधिक दूर हमसे ये दिल उनमें रहता लगा और भी है मोहब्बत का दुनिया में तन्हा नहीं है ज़माने में ऐसा नशा और भी है ।। ख़ुदा जाने सुधरे गी कब अपनी हालत अभी दूर शायद शिफ़ा और भी है ।। अभी मर्ज़ बढ़ता ही तो जा रहा है अभी दर्द से दिल घिरा और भी है अभी रुकने वाला सितम ये नहीं है अभी ज़ुल्म का सामना और भी है न जाने ज़माना कब आएगा अच्छा ज़माना तो ये कुछ बुरा और भी है बुराई का दलदल तो ऐसा है दलदल गिरा इसमें जो भी फंसा और भी है गधा जो समझता है हुशयार ख़ुद को तो समझो गधा वो गधा और भी है ! वो छुप-छुप के करते थे हमले मगर अब खुले ज़ुल्म का सामना और भी है ।। थी उम्मीद जितनी हुई न तरक़्क़ी हाँ पस्ती में सबकुछ गया और भी है 'जहद' हो गई कुछ ख़ता ऐसी-ऐसी जहाँ हमपे अबके हँसा और भी है ।        ~जावेद जहद

आप दिल अपना मुझको बना लीजिए..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 आप दिल अपना मुझको बना लीजिए अपने सीने में मुझको  छुपा  लीजिए । आपके प्यार का मैं ही तो ख़्वाब हूँ अपनी आँखों में मुझको बसा लीजिए आप हँस दें तो फ़स्ल-ए-बहाराँ हँसे ज़ेर-ए-लब ही सही मुस्कुरा लीजिए मेरे अश्आर हैं आप ही के लिए इनको अपने लबों पे सजा लीजिए कुछ हसीनों की है मुझपे क़ातिल नज़र अपनी पलकों में मुझको छुपा लीजिए मुझको दे दीजिए अपने रंज-ओ-अलम और चैन-ओ-सुकूँ सब मिरा लीजिए ।। मिलना चाहें जो मुझसे कभी आप तो मेरी ग़ज़लों से मेरा पता लीजिए ।। दिल हमारा दुखाने से क्या फ़ायदा हम ग़रीबों के दिल की दुआ लीजिए अब तो आज़ाद पंछी हैं हम देश के बेजा सब बंदिशों को हटा लीजिए । ये ग़ज़ल मेरी क्या देगी तुमको 'जहद' आप पढ़के इसे बस मज़ा लीजिए ।।       ~जावेद जहद

बर्बाद ये दुनिया की दुआ साथ लिए जा..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बर्बाद ये दुनिया की दुआ साथ लिए जा जा अब तू तबाही की घटा साथ लिए जा माथे पे लिखे हैं तिरे तो पाप बहुत ही ये कम हों तो कुछ और गुनह साथ लिए जा अब होने लगी हार तिरी चारों तरफ़ ही अब जीत का तू अपनी नशा साथ लिए जा हम जान चुके हैं तिरी तो चाल रे झूठे अब और न कर वादा वफ़ा साथ लिए जा जो आए तो पछताए बहुत दुनिया में मेरी जो भी है बचा वो भी दबा साथ लिए जा आ फिर से ज़माने में सेहत-बख़्श हवा आ जा दौर ये ज़हरीली फ़ज़ा साथ लिए जा । तेरी तो 'जहद' होती है हर बात ही घटिया तू अपनी ये बेकार सदा साथ लिए जा ।।       ~जावेद जेहद

अब न रही गम्भीरता..

   ताज़ा ग़ज़ल 💐 अब न रही गम्भीरता बस सारा जग है चीख़ता झगड़ा, लड़ाई, हिंसा को कहते हैं अब तो वीरता अब ज़ख़्म कोई क्या भरे रह-रह के खंजर चीरता उसमें बुराई है भरी अच्छाई वो क्या सीखत कुछ ही नहीं ये चाहते बाक़ी तो चाहें एकता ऐ काश आँखें मूंद के मुझको भी आलम पूजता न दुनिया ही बदले 'जहद' न ख़ुद वो चोला फेंकता ग़ज़लों में और कुछ भी नहीं वो आशिक़ी बस ढूंढता !! इतनी विधाओं में 'जहद' ग़ज़लों पे मैं तो रीझता    ~जावेद जहद

दिलनशीं दिलरुबा था नाम उसका..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिलनशीं दिलरुबा था नाम उसका दिलों को लूटना था  काम  उसका जितने भी जाँ-निसार थे उसके उनको मिलता रहा पयाम उसका फिर तो कितने ही लोग दौड़ पड़े भरके छलका जो ख़ूब जाम उसका उसपे मँडराते बाज़ रहते थे क्या पता कैसा था वो बाम उसका वो रईसों के दिल की रानी है चंद सिक्का मगर इनाम उसका दिन तो उसका सुकूँ से कटता है रात ग़ारत करे अराम उसका !! वो सभी की है उसका कोई नहीं कोई लेता न हाथ थाम उसका ! जो बिखर जाए सुब्ह होते 'जहद' घर हो आबाद फिर वो शाम उसका        ~जावेद जहद

तेरा चेहरा गुलाब लगता है..

    ताज़ा गुलाब 💐 तेरा चेहरा गुलाब लगता है बड़ा ही लाजवाब लगता है तेरा चेहरा बहुत ही प्यारा है शायरी की किताब लगता है ये मचलना, मटकना, लहराना तेरा पहला शबाब लगता है !! तेरी आँखों से एक लम्हा भी दूर रहना ख़राब लगता है !! तुम मिरे पास जब भी होते हो हर तरफ़ ख़्वाब-ख़्वाब लगता है तेरे आने से मेरे जीवन में आगया इंक़लाब लगता है जिसको जाना है चाँद पर जाए है मिरा माहताब लगता है !! जिसको दुनिया शबाब कहती है वो मुझे तो सराब लगता है !! इस वफ़ा-प्यार की भी दुनिया में कुछ भला, कुछ ख़राब लगता है जब कभी तुम मुझे नहीं मिलते होने फिर इज़्तिराब लगता है !! किसी अच्छे करम का जैसे 'जहद' तेरा मिलना सवाब लगता है !!        ~जावेद जहद

एक ही ज़मीन में दो ग़ज़ल..

      1..ग़ज़ल 💐 ये किस तरह के समंदर का यार साहिल है यहाँ तो चारों तरफ़ चाहतों की महफ़िल है ये उठती लहरें, थपेड़े, हवाओं के झोंके यहाँ की रुत तो क़सम से बड़ी ही क़ातिल है हैं ख़ुशनसीब यहाँ पर हैं जिनके भी बंगले सुकून-ओ-चैन यहाँ कितना उनको हासिल है तुम्हारी बांहों में दिल भूल जाता है हर ग़म सदा ये ऐसे रहे, जैसे आज ग़ाफ़िल है !! यहाँ पे कैसी सुबह, कैसी शाम, कैसी रात यहाँ का सारा ही पल हर घड़ी ही झिलमिल है मोहब्बतों की ये बातों को कौन समझेगा वही तो समझेगा, दिल जिसका यार बिसमिल है हसीं ये सारे नज़ारे हैं कहते क्या न 'जेहद' समझते हम ही नहीं हैं, यही तो मुश्किल है *********************************         2..ग़ज़ल 💐 ये कैसी दुनिया है, कैसी अजीब महफ़िल है यहाँ अँधेरा बहुत है, ये फिर भी झिलमिल है ये मार-काट, लड़ाई, बुरा-बुराई, जलन ये दुनिया आज भी देखो तो कितनी जाहिल है वफ़ाएं, प्यार-मोहब्बत, ख़ुलूस-ओ-हमदर्दी ये दुनिया कितनी ही अच्छाइयों की क़ातिल है है एक मुद्दा सुलझता तो दूजा आ जाता बड़ी ही ये भी तो यारो अजीब मुश्किल है भले ही यूँ तो यहाँ पर हैं मंज़िलें लाखों मगर ये सच है, यहाँ ...

हमें भी प्यार करने की ज़रूरत है ज़रूरत है..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 हमें भी प्यार करने की ज़रूरत है ज़रूरत है तुम्हें भी हम पे मरने की ज़रूरत है ज़रूरत है कि जो इंसाफ़ करते हैं, चलाते हैं जो सरकारें उन्हें भी तो सुधरने की ज़रूरत है ज़रूरत है पुराने सारे झगड़ों से, कि शिकवों से शिकायत से हमें अब तो उबरने की ज़रूरत है ज़रूरत है ।। ज़मीं छत ही नहीं यारो, मकां के सारे खम्भों को सँवरने की, निखरने की ज़रूरत है ज़रूरत है ।। तकब्बुर की बुलंदी से, घमंडों के मिनारों से अरे नादाँ उतरने की ज़रूरत है ज़रूरत है । हैं डूबे जो अँधेरों के बहुत गहरे समंदर में उजालों में उभरने की ज़रूरत है ज़रूरत है नहीं जो ज़ख्म भरते हैं किसी सूरत उन्हें भी तो किसी भी तरहा भरने की ज़रूरत है ज़रूरत है अगर जब दोनों दोषी हों, मगर इक दूजे को कोसें तो क्या इंसाफ़ करने की ज़रूरत है ज़रूरत है ।। ये थोड़ी-थोड़ी तबदीली से होगा क्या ज़माने में 'जहद' सब स्वच्छ करने की ज़रूरत है ज़रूरत है           ~जावेद जहद

छल-कपट, झगड़ा, अदावात पे रोना आया..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 छल-कपट, झगड़ा, अदावात पे रोना आया इस जहाँ के बुरे  हालात पे रोना आया ।। इस चमन का तो भला कर न सका तू भी बहुत तेरी सूखी हुई बरसात पे रोना आया ।। जो बुरा करते हैं उनको ही भला कहते हो आपके अंधे ख़यालात पे रोना आया ।। हो भरा जिसमें तबाही के सिवा कुछ भी नहीं ऐसे तो आतिशी जज़्बात पे रोना आया ।। क्या कहें, कितनी ही बातों से हुआ दिल छलनी और कितने ही बयानात पे रोना आया ।। साथ हो जुर्म-ओ-गुनाहों का या मक्कारी का ऐसे तो दुनिया के हर साथ पे रोना आया ।। आज तक जितनी भी जंगें हुईं और झगड़े हुए उन सभी जीत पे और मात पे रोना आया ।। मुस्तहिक़ जो थे नहीं, उनको भी जो तमग़े मिले मुझको उन झूठे इनामात पे रोना आया ।। हैं बुरे तो बुरे, कितने ही शरीफ़ों की 'जहद' वहशियों जैसी ख़ुराफ़ात पे रोना आया ।।      ~जावेद जहद

बेख़ुदी जिस्म-ओ-जाँ में ढल आई..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 बेख़ुदी जिस्म-ओ-जाँ में ढल आई याद भूली सी इक ग़ज़ल आई ।। नए फ़ैशन में होके मस्त--मगन अधखुली घर से वो निकल आई देख के रंगीं शाम "जूहू" की जान मेरी भी कुछ मचल आई बिजली चमकी तो डर के मारे ही मेरी बांहों में वो उछल आई ।। मैं सहज था तो मेरे ज़ेहनों में जो भी आई ग़ज़ल सरल आई दर्द सहते रहे ख़ुशी से हम राह ख़ुशियों की यूँ निकल आई दिल में तूफ़ान अब नहीं कोई ज़िंदगी लुट के भी सँभल आई इस बदलते हुए ज़माने में ये ग़ज़ल भी शकल बदल आई वो बहारें भी गुल खिला न सकीं ये भी आई तो बे-अमल आई ।। जाने कब जाएगी ये दूर 'जहद' शाम-ए-ग़म है जो आजकल आई      ~जावेद जहद