इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र..
ताज़ा ग़ज़ल इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र मस्त है ये तो सेहर का मंज़र रौशनी बिन ही चमकते तारे ख़ूब ये रब के हुनर का मंज़र रक़्स में ये तो है जाने कब से शाम-ओ-शब और सहर का मंज़र कितना वो प्यारा, सुहाना कितना भूले-बिसरे से सफ़र का मंज़र !! अपने तो फ़न में नज़र आता है मीठे-मीठे से समर का मंज़र !! सुर्ख़ हैं उनके कली, गुल, बूटे सब्ज़ है जिनके शजर का मंज़र आज है ऐसा तो कल क्या होगा फ़िक्र में डूबे बशर का मंज़र !! आज ये हाल 'जहद' है जग का चारों ही सिम्त शरर का मंज़र !! जावेेद जहद