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इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र..

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            ताज़ा ग़ज़ल इश्क़ में डूबी नज़र का मंज़र मस्त है ये तो सेहर का मंज़र रौशनी बिन ही चमकते तारे ख़ूब ये रब के हुनर का मंज़र रक़्स में ये तो है जाने कब से शाम-ओ-शब और सहर का मंज़र कितना वो प्यारा, सुहाना कितना भूले-बिसरे से सफ़र का मंज़र !! अपने तो फ़न में नज़र आता है मीठे-मीठे से समर का मंज़र !! सुर्ख़ हैं उनके कली, गुल, बूटे सब्ज़ है जिनके शजर का मंज़र आज है ऐसा तो कल क्या होगा फ़िक्र में डूबे बशर का मंज़र !! आज ये हाल 'जहद' है जग का चारों ही सिम्त शरर का मंज़र !!                जावेेद जहद

एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी..

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            ताज़ा ग़ज़ल एक दिन मेरी ऐसी चढ़ी तेवरी इक बनाई ग़ज़ल तो बनी "तेवरी" यूँ तो थी दिलनशीं सर से वो पैर तक पर मुझे उसकी अच्छी लगी तेवरी !! कल तलक तेवरों से भरे जो भी थे आज उनकी भी ठंडी पड़ी तेवरी ! लोग सारे ज़माने को कर देते ठीक पर न अबतक सही से चढ़ी तेवरी जिनकी रहती है ठंडी सितम के ख़िलाफ़ वो रहेगी  मरी की  मरी  तेवरी !! एक हीरो मरा तो हुआ क्या नहीं लोग भूखे मरे न चढ़ी तेवरी !! तुम न पूछो मिरी शायरी का मिज़ाज जाने कैसी है मेरी अभी तेवरी !! "तेवरी" जब लिखो तो रहे ये ख़याल हो विरोधों के रस से भरी  "तेवरी" ये ज़रूरी नहीं दिलनशीं हो 'जहद' चाँद-तारों से उनकी भरी तेवरी !!                जावेेद जहद