एक ही ज़मीन में दो ग़ज़ल..
1..ग़ज़ल हर तरफ़ जब है अंधकार बहुत कैसे फिर आएगी बहार बहुत ? इस परेशान से ज़माने को मौसमों की भी अब है मार बहुत इक तरफ़ क़ैद होते हैं कितने इक तरफ़ हो रहे फ़रार बहुत इतनी मुहतात पर भी ये दुनिया हो रही मौत की शिकार बहुत ! हम तो उनसे हैं इसलिए पिछड़े वो हैं हमसे तजुर्बाकार बहुत !! उसको समझो कि मिल गई जन्नत जिसका घर-भर वफ़ाशिआर बहुत आओ आँखें लड़ा के देखें हम किसकी आँखों में है ख़ुमार बहुत अब बताओ कि चाहिए कैसी देख ली आपने बहार बहुत !! वो ज़माना था और ही यारो अब तो दो और दो हैं चार बहुत उसके चेहरे पे सुर्ख़ी रहती है उसके अंदर है शर्म यार बहुत यूज़ इसको करो न जाड़े में सर्द है शरबत-ए-अनार बहुत बाद में उसपे वो सिहरने लगा पहले भड़का ज़मीनदार बहुत उसका उपचार तो ज़रूरी है जो भी शय है 'जहद' बिमार बहुत *********************** 2..ग़ज़ल छा गया जग पे है ग़ुबार बहुत चाहिए पड़नी अब फुहार बहुत लूटता रह गया वो प्यार बहुत उसका प्यारा था व्यवहार बहुत इसलिए है वो बे-क़रार बहुत उसके कांधे पे है जो भार बहुत अब पंहुच वाले नाम करते हैं और पड़े रहते होनहार बहुत तन-बदन टूट जाए है जैसे ज़िंदग...