गुलशन है, पेड़-पौधे, कली-गुल, बहार है..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 गुलशन है, पेड़-पौधे, कली-गुल, बहार है उसमें ही एक ख़ित्ता बड़ा ख़ारदार है !! वैसे तो उसका होता बड़ों में शुमार है लेकिन वो आदमी तो बड़ा ख़ाकसार है किस काम की भला वो बड़ी ऐसी शख़्सियत जिसको दबाए रक्खे घिनौना हिसार है !! करना है गर जफ़ाएं तो दुश्मन से अपने कर उस से न कर जफ़ा तू जो तुझपे निसार है !! लगने लगी है आग 'जेहद' चारों ही तरफ़ इस बार किस तरह की ये आई बहार है ! नाहक़ ही कितने मरते हैं दंगे-फ़साद में पर छोड़ो, इससे कौन यहाँ शर्मसार है ! कैसे करेगा सारे ज़माने का वो इलाज मुद्दत से जिस बशर का ज़ेहन ख़ुद बिमार है कितनी ही बार कर चुका है हमसे तू फ़रेब कैसे मैं मान लूँ कि तिरा सच्चा प्यार है !! बर्बाद करके रख दिया उसने तुझे 'जहद' अब और किस बला का तुझे इंतेज़ार है ~जावेद जहद