ज़ख़्म-ए-दिल छेड़ो न ये और परेशाँ होगा..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐 ज़ख़्म-ए-दिल छेड़ो न ये और परेशाँ होगा दर्द उट्ठे गा तो फिर कोई न दरमाँ होगा !! लायक़-ए-फ़ख़्र वो अब कौन सा इंसाँ होगा किसके आने से ये आबाद गुलिस्ताँ होगा ? इश्क़ होता है जो ज़ाहिर तो उसे होने दो इश्क़ इक रोज़ तो बस यूँही नुमायाँ होगा अभी तो समझो कि आई है जवानी उनपे अभी तो और भी वो हश्र-बदामाँ होगा !! मानता हूँ न मिलेगी हमें जन्नत यूँ ही और जिसे मिल गई तो कितना वो हैराँ होगा वक़्त आने दो दिखा देंगे हक़ीक़त ये भी कौन इस देश पे जी-जान से क़ुरबाँ होगा मार सकता है भला कौन किसी को कैसे जब ख़ुदा ही न किसी मौत का ख़्वाहाँ होगा गर ख़ुदा की जो इबादत न करोगे कुछ भी रोज़-ए-महशर तिरा फिर कौन वाँ पुरसाँ होगा वस्ल का दिन है हुआ क़िस्सा भी ये ख़त्म 'जेहद' अब शुरू ये होगा भी तो शब-ए-हिज्राँ होगा !! #जावेेद_जेेेहद करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया