अब न रही गम्भीरता..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 अब न रही गम्भीरता बस सारा जग है चीख़ता झगड़ा, लड़ाई, हिंसा को कहते हैं अब तो वीरता अब ज़ख़्म कोई क्या भरे रह-रह के खंजर चीरता उसमें बुराई है भरी अच्छाई वो क्या सीखत कुछ ही नहीं ये चाहते बाक़ी तो चाहें एकता ऐ काश आँखें मूंद के मुझको भी आलम पूजता न दुनिया ही बदले 'जहद' न ख़ुद वो चोला फेंकता ग़ज़लों में और कुछ भी नहीं वो आशिक़ी बस ढूंढता !! इतनी विधाओं में 'जहद' ग़ज़लों पे मैं तो रीझता ~जावेद जहद