कभी तो उसकी मोहब्बत का दास मैं भी था..
ताज़ा ग़ज़ल
कभी तो उसकी मोहब्बत का दास मैं भी था
झुकाए सर को खड़ा उसके पास मैं भी था !
जिसे समझते हो तुम आज धड़कनें अपनी
किसी ज़माने में उसकी तो सांस मैं भी था !
तिरा नसीब था, तुमको जो मिल गई वो भी
नहीं तो उसकी मोहब्बत में पास मैं भी था !
दिखाऊँ कैसे मैं सागर की आपको फ़ोटो
कि जल की परियों के संग कम-लिबास मैं भी था
सँभल गया है मिरा दिल नहीं तो पहले कभी
तुम्हारे जैसा कई बुत-शनास मैं भी था !!
तुम्हें है तिश्निगी जिसके मिलन की शिद्दत से
उसी की तेज़ बड़ी भूख-प्यास मैं भी था !!
जबीं झुकाए हुए वो सुपुर्द था मेरे
बिछाए दिल को पड़ा उसके पास मैं भी था
कि जब था तोड़ा गया प्यार में 'जहद' दिल को
अकेले तुम ही नहीं, तब उदास मैं भी था !!
~ जावेद जहद
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