बेख़ुदी जिस्म-ओ-जाँ में ढल आई..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 बेख़ुदी जिस्म-ओ-जाँ में ढल आई याद भूली सी इक ग़ज़ल आई ।। नए फ़ैशन में होके मस्त--मगन अधखुली घर से वो निकल आई देख के रंगीं शाम "जूहू" की जान मेरी भी कुछ मचल आई बिजली चमकी तो डर के मारे ही मेरी बांहों में वो उछल आई ।। मैं सहज था तो मेरे ज़ेहनों में जो भी आई ग़ज़ल सरल आई दर्द सहते रहे ख़ुशी से हम राह ख़ुशियों की यूँ निकल आई दिल में तूफ़ान अब नहीं कोई ज़िंदगी लुट के भी सँभल आई इस बदलते हुए ज़माने में ये ग़ज़ल भी शकल बदल आई वो बहारें भी गुल खिला न सकीं ये भी आई तो बे-अमल आई ।। जाने कब जाएगी ये दूर 'जहद' शाम-ए-ग़म है जो आजकल आई ~जावेद जहद