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Showing posts with the label #जावेद_जहद..सासाराम

दिल-जिगर, जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम..

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             ताज़ा ग़ज़ल दिल-जिगर, जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम तुम हो जानाँ बड़ी हसीं मासूम !! चाँद, तारे, परिंदे, झील, कँवल कोई तुमसा लगे नहीं मासूम ! शोख़, चंचल, शरीर, ढीठ कहीं और नज़र आती हो कहीं मासूम तुमको मिलती जहाँ है मासूमी आओ चलते हैं हम वहीं मासूम ग़ुस्से में इन लबों को मत भींचो खेलती है हँसी  यहीं मासूम !! वो बड़ा ही नसीब वाला है जिसका दिलवर हो दिलनशीं मासूम आज ऐसे 'जहद' ये बदला रूप जैसे ये था कभी नहीं मासूम !!                  #जावेेद_जहद

यहाँ, वहाँ दिल-नज़र का मंज़र..

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              ताज़ा ग़ज़ल यहाँ, वहाँ दिल-नज़र का मंज़र मोहब्बतों के सेहर का मंज़र !! तिरी अदा तो है जैसे जानम क़दम-क़दम पे लहर का मंज़र हसीन ये भी लगे है कितना ख़िज़ाँ-रसीदा शजर का मंज़र नगर-नगर में, शहर-शहर में डगर-डगर में ग़दर का मंज़र तरह-तरह के ख़ुदा ये तेरे अजब-ग़ज़ब से बशर का मंज़र सँवर गया है या और यारो बिगड़ गया इस दहर का मंज़र शजर में अपने सजा रहा हूँ हसीं-हसीं से शजर का मंज़र छुपा-छुपा कुछ, अयाँ-अयाँ कुछ अजब है मेरे सफ़र का मंज़र !! बशर-बशर में 'जहद' अदावत नज़र-नज़र में शरर का मंज़र              जावेेद जहद

रात भर सांसों में कुछ महका बहुत..

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          ताज़ा ग़ज़ल रात भर सांसों में कुछ महका बहुत याद आया फूल सा चेहरा बहुत !! क्या सदा थी वो कि ये दिल मुज़्तरिब जानिब-ए-दर बारहा लपका बहुत !! वो मिला ऐसे कि सांसें बढ़ गईं और दिल भी ज़ोर से धड़का बहुत उसने जो मुझको दिया पहले-पहल क़ीमती था प्यार का तोहफ़ा बहुत ! मयकदे से इक तिरे जाने के बाद साक़िया, लगते हैं सब तन्हा बहुत मुझमें जाने ऐसी क्या हैं ख़ूबियाँ याद करती है मुझे दुनिया बहुत आ भी जाओ अब 'जहद' तुम सामने छुप-छुपा के हो गया पर्दा बहुत !!               जावेेद जहद

मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ..

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        ताज़ा ग़ज़ल मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ बनती नहीं वो उम्दा शकल सोच रहा हूँ वो जिससे निकलती हैं सदा आग की लपटें किस तर्ह खिला है वो कँवल सोच रहा हूँ !! हो जाए बरी जिससे जहाँ सारे दुखों से इक ऐसा ही मैं कोई अमल सोच रहा हूँ मुझ जैसा ज़माने में बशर कोई नहीं है क्या है कोई भी मेरा बदल सोच रहा हूँ कब सोती है जी चैन से ये आज की दुनिया कब नींद मे होता है ख़लल सोच रहा हूँ !! पहले तो तमन्नाओं में उलझा लिया ख़ूद को अब ज़िंदगी हो जाए सहल सोच रहा हूँ !! वो प्यार का इज़हार तो करते नहीं पहले कर दूंगा कभी मैं ही पहल सोच रहा हूँ ! दिल इश्क़ में बिगड़ा तो बिगड़ता ही रहा फिर कैसे कोई जाता है सँभल सोच रहा हूँ !! इक हद की बुलंदी लिए सोचा था 'जहद' कुछ अब उससे ज़रा आगे निकल सोच रहा हूँ !!                       जावेेद जहद सहसरामी