मुअत्तर जिस्म से ये रूह तक थी..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐 मुअत्तर जिस्म से ये रूह तक थी वो उसके प्यार की ऐसी महक थी नज़र के जाम में इतनी छलक थी कि बस पीने पिलाने की ललक थी कभी देखा नहीं वैसा चराग़ाँ मिलन की रात की भी क्या दमक थी समा बैठे थे हम इक दूजे में यूँ कि अपनी मिट गई सारी झिझक थी सुहाने उसके चेहरे के मुक़ाबिल नहीं दुनिया की कोई भी चमक थी हो जैसे शीशे की वो झाड़ कोई बदन में उसके ऐसी ही खनक थी ग़ज़ल हम कम ही कहते हैं जी अब तो बहुत इसकी मुझे पहले सनक थी !! मिरे ग़म के दिनों में भी 'जेहद' वो मिरे होंठों पे उसकी ही चहक थी #जावेेद_जेेेहद करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया