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Showing posts from March, 2021

बस दौरे पे जो जाए तो लगता है कि तुम हो..

          ताज़ा ग़ज़ल 💐 बस दौरे पे जो जाए तो लगता है कि तुम हो दौलत जो लुटा आए तो लगता है कि तुम हो खींचे रहे सन्नाटा कभी और कभी ख़ूब पागल सा जो चिल्लाए तो लगता है कि तुम हो साधू की तरह बनके सियासत की गली में इक आँख जो मटकाए तो लगता है कि तुम हो जो काम ज़रूरी है वही सत्ता में आके जो शख़्स न कर पाए तो लगता है कि तुम हो करता रहे ग़लती जो, डुबाता रहे नइया फिर भी नहीं पछताए तो लगता है कि तुम हो पानी में मचलती हुई मछली जो हवा में लहरा के उछल जाए तो लगता है कि तुम हो उल्फ़त की कहानी में किसी पल जो अचानक मौसम सा बदल जाए तो लगता है कि तुम हो पैमाना शराबों से भरा ख़ूब लबालब आपस में जो टकराए तो लगता है कि तुम हो जो कहना नहीं चाहिए वो सब भी ग़ज़ल में जो कहता चला जाए तो लगता है कि तुम हो बकबक करे हर वक़्त 'जहद' फिर भी मगर जो कुछ बात छुपा जाए तो लगता है कि तुम हो ।।          ~जावेद जहद

अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा क्या कहें पहले सा वो वतन ना रहा ।। अब शहर-गांव और ना किसी सम्त भी सच तो ये है वफ़ा का चलन ना रहा ।। हिंदू-मुस्लिम हों ईसाई या कोई भी अब किसी में भी वो अपनापन ना रहा दिल गुनहगार हैं, चेहरे मक्कार हैं जिस्म पर भी वो अब पैरहन ना रहा घर के बटवारे में दिल भी बट-बट गए इसलिए ही तो हो अब मिलन ना रहा  कितने रंगों का मेला लगा है 'जहद' हाँ मगर रंग-ए-गंग-ओ-जमन ना रहा        ~जावेद जहद

करो या ना करो जानम कोई सिंगार होली में..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 करो या ना करो जानम कोई सिंगार होली में लगा के रंग हो जाना हसीं तुम यार होली में ये रंगों का परब है जी कि इसके बिन मज़ा कैसा उड़ा के रंग कर दो सारा जग गुलज़ार होली में । ग़ज़ल होली पे कहनी हो तो उसमें रखना बस ये ख़्याल कि पूरा होली जैसा हो ग़ज़ल का सार होली में ।। ग़ज़ल क्या सुनते हो होली में यारो फीकी-फीकी सी बजाओ गाना देवर-भौजी  का झंकार होली में ।। मनाओ मौज-मस्ती, झूमो-नाचो चाहे जितना भी करो पीकर किसी से तुम न लेकिन मार होली में लड़ें तो लड़ने दो आँखें, चढ़ें तो चढ़ने दो आँखें जिगर के पार हो आँखों की ये तलवार होली में 'जहद' घूमो-फिरो, सबसे मिलो तुम आज हँस-हँस के रहो घर में पड़े तुम ऐसे ना बीमार होली में ।।           ~जावेद जहद

बड़े हो गर तो बनो भी आला..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 बड़े हो गर तो बनो भी आला कि काम सारा करो भी आला ये बेतुके बोल छोड़ो यारो कहो भी आला, सुनो भी आला तुम्हारी इज़्ज़त हैं करते सारे हुज़ूर-ए-आला, रहो भी आला बड़े जो बनते हो दर्द वाले तो दर्द फिर तुम सहो भी आला जो चाहते हो बड़ा ख़ज़ाना तो यार माला जपो भी आला हो आला लेखक समझते ख़ुद को तो सारी रचना रचो भी आला ।। जो चाहते हो उड़ान ऊंची तो पंख अपने करो भी आला अगर समझते हो ख़ुद को अद्भुत करिश्मा कोई करो भी आला ।। अगर चे सच में न चाहते हो तो सारी क़दरें ढहो भी आला 'जहद' जो बन्ना हो अच्छा शायर पढ़ो भी आला, लिखो भी आला      ~जावेद जहद

ऐ मिरी ज़िंदगी कुछ काम न आएगी क्या..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन 2122  1122  1122  22 ऐ मिरी ज़िंदगी कुछ काम न आएगी क्या तू मिरे ख़्वाबों की ताबीर न लाएगी क्या हर तरफ़ ख़ौफ़ है, ख़ूँरेज़ी है, मनमानी है इन दिनों की हसीं अब शाम न आएगी क्या इक ज़माने से तुझे मैंने सनम देखा नहीं अब तड़प मेरी तुझे खींच न लाएगी क्या दिल मचलता है मिरा फिर तिरी मयनोशी को प्यार का फिर तू लिए जाम न आएगी क्या हर तरफ़ रोज़ ही होने लगी है अपनी शिकस्त अब फ़तह कोई मिरे नाम न आएगी क्या ? हर शमा बुझ गई अच्छाइयों की क्या यारो ज़ुलमतों से ये कभी अब नहीं टकराएगी क्या क्या ज़माना है 'जहद' मिट गई है सारी वफ़ा अब किसी के भी ये कुछ काम न आएगी क्या         ~जावेद जहद

जो अपनी मोहब्बत पे क़ुर्बान नहीं होगा..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे हज़ज मुसम्मन अख़रब मक़फ़ूफ़ मक़फ़ूफ़ मुख़न्नक सालिम मफ़ऊल मुफ़ाईलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन 221  1222  221  1222 जो अपनी मोहब्बत पे क़ुर्बान नहीं होगा वो शख़्स कभी भी तो कमरान नहीं होगा जो राह-ए-मोहब्बत में डर जाए क़दम रखते वो होगा कोई बुज़दिल, बलवान नहीं होगा । कुछ ऐसी दिवारें हैं इक बार जो उठ जाएं फिर दिल का किसी सूरत मीलान नहीं होगा ऐ यार तिरी सूरत, सीरत न सेहत अच्छी जा तुझ पे कोई दिल से क़ुर्बान नहीं होगा फिर उसने मसल डाला इक फूल सी गुड़िया को हैवान कोई होगा, इंसान नहीं होगा !! ये काले घने बादल जो छाए हैं बरसों से इस रुत को बदलना तो आसान नहीं होगा क़ातिल सी निगाहों से देखा है 'जहद' उसने वो अपना कोई होगा, अंजान नहीं होगा ।।       ~जावेद जहद

कि दिल में मिरे जो भी घर कर गया..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक़सूर फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल 122  122  122  12 कि दिल में मिरे जो भी घर कर गया समझिए कि मुझको वो सर कर गया रसीला था इतना ही उसका वजूद कि छूते ही मुझको वो तर कर गया ये कैसे बताएं कि इक मेहरबां हमारी वो क्या-क्या नज़र कर गया वो आया था दिल को बिछाए मगर गया तो वो तेढ़ी नज़र कर गया ।। जहाँ से कभी भी मैं गुज़रा न ख़ुद वहाँ भी वो मुझ में गुज़र कर गया वफ़ा, प्यार, उल्फ़त के वो साथ ही मुलाक़ात भी मुख़्तसर कर गया । भला इश्क़ जितना है उतना बुरा मुझे उनका ग़म ये ख़बर कर गया वो कैसा था इंसाफ़ वाला भी जो इधर की अमानत उधर कर गया 'जहद' अब यहाँ तो हैं बैचैनियाँ कि अच्छा है जो भी सफ़र कर गया      ~जावेद जहद

ख़बर आई है इक ऐसी बहुत बेकार होली में..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 1222  1222  1222  1222 ख़बर आई है इक ऐसी बहुत बेकार होली में जिसे सुन हो गया सारा जहाँ बीमार होली में लहर ये दूसरी तो पहले से भी ज़्यादा घातक है ज़रा तुम बचके रहना दोस्तो इस बार होली में हुई बेरंग ये दुनिया, लगेगा क्या परब अच्छा कि चाहे लाख करलो रंगों की बौछार होली में यहाँ सब मर रहे हैं फ़िक्र से दिन-रात घुट घुट के वहाँ वो कर रहे बस अपना ही प्रचार होली में था पहले ही से सन्नाटा, ये अब तो और गहराया कभी देखा नहीं इतना बुरा बाज़ार होली में ।। मनाते हैं इसे अच्छे से सारे ही तो अच्छे लोग मचाते हैं बड़ा कोहराम पर बदकार होली में बड़ा दिलकश नज़ारा होता है वो तो मोहब्बत का लगा के रंग होता है शुरू जो प्यार होली में ।। 'जहद' इस आपदा का कुछ तो हल्का होगा दर्द-ओ-ग़म कि दारू, भांग, गांजा जम के ले तू मार होली में ।।        ~जावेद जहद

ये सच है तू ही सनम मुझपे मरने वाला है..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे मुजतस मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़ मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 1212  1122  1212  22 ये सच है तू ही सनम मुझपे मरने वाला है मिरी वफ़ा को मगर तूने मार डाला है !! ये दिल दिवाना तिरे ग़म में कबका मर जाता बहुत मनाया है इसको, बहुत सँभाला है !! बड़ी ही तल्ख़ी है मीठा सा कुछ उछालो इधर हवा में देखो न मैंने भी कुछ उछाला है !! दिया है यार ने मेरे जो दिल को दाग़-ए-सितम अजीब रंग है वो, नीला है न काला है !! कहो तो  याद में तेरी  गुज़ार दें  यूँ ही मगर यूँ जीने सी भी कुछ न होने वाला है तू होके दूर भी  मुझसे  तो पास है मेरे कि मेरे दिल में तिरी यादों का उजाला है सभी को भाता है जो ख़ूब अपनी ग़ज़लों में मोहब्बतों का वही रास्ता निकाला है !! ये दौर अच्छा बुरा है या चाहे जैसा भी कि इस अँधेरे में भी फैला कुछ उजाला है अजीब हाल है दुनिया का कुछ भी होश नहीं न जाने हश्र 'जहद' कैसा होने वाला है !!        ~जावेद जहद

तेरी गली की सैर कराता रहा मुझे..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफ़ूफ़  मकफ़ूफ़ महज़ूफ़ मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन 221  2121  1221  212 तेरी गली की सैर कराता रहा मुझे वो तेरा प्यार था जो बुलाता रहा मुझे तेरे हसीं ख़्याल का वो तो कमाल था घर बैठे जो बहिश्त दिखाता रहा मुझे पाया नहीं किसी भी तो महफ़िल दयार में तेरी गली में लुत्फ़ जो आता रहा मुझे !! इक भूक प्यास थी वो या कोई सेहर था वो तेरी तरफ़ जो खींच के लाता रहा मुझे !! हर बार हर मिलन मेंं तिरा जलवा जादुई क्या क्या अजीब रंग दिखाता रहा मुझे घुल-मिल गया था मुझसे मिरा यार इस क़दर हर एक बात अपनी बताता रहा मुझे !! वो चाहता था मैं रहूं होश-ओ-हवास में पर वो दिवाना और बनाता रहा मुझे !! वो हो गया था हावी मिरे दिल पे इस क़दर जिस तर्ह जी में आया नचाता रहा मुझे !! कहता कोई किसी पे लुटा दे तू ज़िंदगी दिल ना लगाना कोई बताता रहा मुझे वो चाहता था जितनी ही बर्बादियाँ मिरी उसका सितम तो और बनाता रहा मुझे मुझको बनाके अब्र सा पागल हवा का वो झोंका कहाँ-कहाँ न उड़ाता रहा मुझे !! वो चाहता था मुझको बनाना तो और कुछ मेरा जुनूँ कुछ और बनाता रहा मुझे !! बे-अक़्ल, ...

कोई भी जग में आती है बहार आहिस्ता आहिस्ता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 1222  1222. 1222  1222 कोई भी जग में आती है बहार आहिस्ता आहिस्ता किसी भी शै पे छाता है निखार आहिस्ता आहिस्ता अचानक जो नशा चढ़ता उतरता भी अचानक है जो जल्दी न चढ़े उतरे ख़ुमार आहिस्ता आहिस्ता बहुत उलझी हैं ये ज़ुल्फ़ें गुज़िश्ता रात में शायद बड़े ही प्यार से इनको सँवार आहिस्ता आहिस्ता  झटक दे झटके से उसको कि जो भी सर पे है तेरे या फिर उस बोझ को ले तू उतार आहिस्ता आहिस्ता बहुत से हो चुके इस दौर में और अब जो हैं बाक़ी कभी हो जाएंगे वो भी बिमार आहिस्ता आहिस्ता मैं वो शायर नहीं जो आँधी जैसे आते-जाते हैं कराया मैंने है ख़ुद को शुमार आहिस्ता आहिस्ता ये रातों-रात शोहरत की 'जहद' सोचो न तुम बातें सफ़लता मिलती है अक्सर अपार आहिस्ता आहिस्ता        ~जावेद जहद

रुत मोहब्बत की, क़दम फूलों का..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहरे-रमल मुसद्दस मख़बून मुसक्कन 2122. 1122  22 / 112 रुत मोहब्बत की, क़दम फूलों का फिर न लाया  वो सनम फूलों का जाने क्यों मुझको चुभे कांटे ही जब कभी चाहा करम फूलों का हँसते फूलों को निहारे हैं सभी किसने देखा है अलम फूलों का है मिरे चारों तरफ़ फुलवारी फिर भी है मुझको तो ग़म फूलों का क्या कहें उसके लबों की नर्मी उसका तो है जी क़दम फूलों का आम फूलों का है ये बाग़ नहीं बाग़ है ये तो अहम फूलों का फूल हाथों में, गले, जूड़े में फूल पे है ये करम फूलों का फूल बदलेंगे कहानी अपनी ये यक़ी है या वहम फूलों का तुम तो कांटों में 'जहद' जीते हो फिर भी क्यों भरते हो दम फूलों का     ~जावेद जहद

दिल जिगर जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम..

   ताज़ा ग़ज़ल 💐 2122  1212  22/ 112 दिल जिगर जिस्म-ओ-जाँ, जबीं मासूम तुम हो जानां  बड़ी हसीं मासूम !! चाँद, तारे, परिंदे, झील, कँवल कोई तुम सा लगे नहीं मासूम शोख़, चंचल, शरीर, ढीठ कहीं और.नज़र आती हो कहीं मासूम तुमको मिलती जहाँ है मासूमी आओ चलते हैं हम वहीं मासूम इन लबों को ख़फ़ा सी मत भींचो खेलती है हँसी यहीं मासूम !! वो बड़ा ही नसीब वाला है जिसका दिलवर हो दिलनशीं मासूम आज ऐसे 'जहद' ये बदला रूप जैसे ये था कभी नहीं मासूम !!      ~जावेद जहद

कितना हसीन-ओ-दिलकश ये देश है हमारा..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 221 2122 221 2122 कितना हसीन-ओ-दिलकश ये देश है हमारा आए न गर्दिशों में इसका कभी सितारा ।। जंगल पहाड़ सागर, क्या कुछ यहाँ नहीं है क़ुदरत ने इसको जैसे फ़ुर्सत में है सँवारा हिंदू हों सिख इसाई, या जाट या मराठा हो जाता है यहाँ पर सबका ही तो गुज़ारा लड़ जाते हैं कभी हम आपस में यूँ तो यारो लेकिन बहुत है हम में सचमुच में भाईचारा इतना है प्यार हमको इस सरज़मीं से यारो इसके लिए हमें तो मरना भी है गवारा ।। अशरफ़ बना के हमको भेजा है जब ख़ुदा ने अब ख़ुद बनें बुरे तो है ये बड़ा ख़सारा ।। हो जाए कोई ग़लती और उसका दिल में दुख हो कोशिश रहे कि वैसा न हो कभी दुबारा ।। दिल और दिमाग़ रौशन करके 'जहद' ये अपना बन जाओ तुम भी कोई आकाश का सितारा ।     ~जावेद जहद

ख़ुद भी सुधरो, सुधार दो सबको

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 2122 1212 22/112 ख़ुद भी सुधरो, सुधार दो सबको वर्ना साहब  बिगाड़ दो सबको ! ये लड़ाने से सबको अच्छा है एक ही बार मार दो सबको ! आज इसकी बहुत ज़रूरत है खोल के दिल को प्यार दो सबको सिर्फ़ अपनी ही मौज मत देखो ज़िंदगी की बहार दो सबको !! फिर कभी भी बिगड़ न पाए कोई इस तरह से सँवार दो सबको !! बेवजह जो चढ़े हैं सर तेरे हो सके तो उतार दो सबको सब 'जेहद' मस्त-मस्त हो जाएं यूँ सुख़न का ख़ुमार दो सबको     ~जावेद जेहद

वो मोहब्बत का बाग़ मिलता नहीं..

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     ताज़ा ग़ज़ल 💐 वो मोहब्बत का बाग़ मिलता नहीं ढूंढता हूँ  सुराग़ मिलता नहीं !! चेहरे मिलते तो हैं हसीं अब भी दिल मगर बाग़-बाग़ मिलता नहीं ये हमारी भी कैसी क़िस्मत है हमें ग़म से फ़राग़ मिलता नहीं हम भी बदकार हैं मगर तेरे दाग़ से अपना दाग़ मिलता नहीं हम उधर भागने लगे हैं जहाँ रौशनी का चराग़ मिलता नहीं दिल मिरा मिल गया उसे फिर भी मेरे ग़म का सुराग़ मिलता नहीं !! ऐसा क्या मिल गया तुम्हें भी 'जेहद' जो तुम्हारा दिमाग़ मिलता नहीं !!             जावेेद जेेेहद  करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया

150 Ghazals 💐

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दोस्तो ! अपने इस साइट की ये एक सौ पचासवीं ग़ज़ल.. अब तक इसे हज़ारों लोगों ने देखा, स्नेह दिया.. आप सभी का तहेदिल से शुक्रिया ..आभार 💐💐 चाहता था, वो मगर आता न था साथ मेरे  हमसफ़र आता न था ख़्वाब में आता था इक साया मगर सामने कोई नज़र आता न था !! घूमता था उसकी दुनिया में ये दिल रात भर अपने ये घर आता न था ! ढूंढती रहती थींं आँखें बस उसे और वो पहरो नज़र आता न था उनसे मिलने की जगह ऐसी थी वो इक परिंदा भी जिधर आता न था आपसे मिलने से पहले तो मुझे दिल लगाने का हुनर आता न था उनकी चाहत का नशा ऐसा चढ़ा एक लम्हा भी उतर आता न था ! क्या मुसीबत की घड़ी थी वो 'जेहद' बरसों मैं जिससे उबर आता न था !            जावेेद जेेेहद (जमशेद अख़्तर) करन सराय, सासाराम, बिहार, इंडिया

तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है मोहब्बत से भरने को जी चाहता है समा कर तुम्हारी इन आँखों में प्यारी कि दिल में उतरने को जी चाहता है ! तुम्हारी ये दिलकश अदा पर तो जानम हर इक पल ही मरने को जी चाहता है बना कर तुम्हें अपने दिल की तमन्ना कि बांहों में भरने को जी चाहता है तुम्हारी घटाओं सी ज़ुल्फ़ों को छूकर हवा सा गुज़रने को जी चाहता है !! समा कर तुम्हारी ये नाज़ुक रगों में लहू सा उभरने को जी चाहता है ! सफ़र अपना सारा सनम छोड़ कर अब तिरे दर ठहरने को जी चाहता है !! तुम्हारे 'जेहद' तो हर इक दर्द के ही भँवर में उतरने को जी चाहता है !!       ~जावेद जेहद

दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश वैसी ही हूबहू है मिरे यार की कशिश !! होती है उतनी ही तो वफ़ा-प्यार की कशिश मद्धम की हो या चाहे ये बौछार की कशिश जिसको पसंद आ गई घर-द्वार की कशिश भाती नहीं है फिर उसे बाज़ार की कशिश अब पूछिए न मुझमें कशिश कितनी है जनाब ये दुनिया जानती है क़लमकार की कशिश !! बनना है पुर-कशिश तो सभी अपनी ज़ात में पैदा करो मोहब्बत-ओ-ईसार की कशिश !! सारे जहाँ को उसने दिवाना बना लिया देखो तो उस सियाने अदाकार की कशिश होगी किसी को चाह किसी हूर की 'जेहद' अपने लिए तो बस वही रुख़सार की कशिश        ~जावेद जेहद

बहारों का दिलकश समां ढूंढते हैं..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 बहारों का दिलकश समां ढूंढते हैं कि हम ख़ुशनुमा गुलसितां ढूंढते हैं है अपना जहाँ सबसे प्यारा तो फिर क्यों कोई दूसरा हम जहां ढूंढते हैं ? कहीं मह्ल कितने ही वीरां पड़े हैं कहीं लोग बस इक मकां ढूंढते हैं जो मुझपे फ़िदा हो, करे मेरी पूजा अब अरमां मिरे वो बुतां ढूंढते हैं ! भरा प्यार ही प्यार हो जिस जगह पर चलो एक ऐसा जहां ढूंढते हैं !! झुलसती है जब भी किसी दिल की बस्ती न जाने सभी क्यों धुआं ढूंढते हैं !! कहीं लोग नफ़रत सी फैला रहे हैं कहीं लोग अम्न-ओ-अमां ढूंढते हैं 'जेहद' क्या ज़माना हमें दर्द देगा कि हम दर्द का ही जहां ढूंढते हैं     ~जावेद जेहद

चारों ही तरफ़ वक़्त की अँगड़ाइयाँ मिलीं..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 चारों ही तरफ़ वक़्त की अँगड़ाइयाँ मिलीं हर राह में नई-नई तबदीलियाँ मिलीं !! दिल को मिरे कहीं भी न तन्हाइयाँ मिलीं तन्हाई में भी उनकी ही परछाइयाँ मिलीं औरों की भी इनायतें मुझ पे हुईं मगर तुझ सी किसी में भी न वफ़ादारियाँ मिलीं करने से ऐश कुछ तो सुकूँ मिल गया मुझे दिल को मगर तो और भी बेचैनियाँ मिलीं मँगाइयाँ तो नाम की ही झोंपड़ों में थीं महलों के आस-पास ही मँगाइयाँ मिलीं पूछो न मुझसे अब मिरी परवाज़ है कहाँ जबसे हैं मेरी फ़िक्र को गहराइयाँ मिलीं कहने को हम तो हो गए आज़ाद हैं 'जेहद' लगता नहीं हमें अभी आज़ादियाँ मिलीं !!      ~जावेद जेहद

तुम्हारे बिना जग भला ना लगेगा..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 तुम्हारे बिना जग भला ना लगेगा कि चारों तरफ़ ही विराना लगेगा जो तुम साथ होगे मज़ा होगा हरदम हो मौसम कोई भी सुहाना लगेगा !! ग़ज़ल में तुम्हारी जो बातें न होंगी तो सुनकर तुम्हें क्या बुरा ना लगेगा चलो प्यार करने दें हम सब गुलों को गुलिस्तां बड़ा आशिक़ाना लगेगा !! अगर देख लोगे जिसे प्यार से तुम तो तेरा वो होने दिवाना लगेगा !! अगर नफ़रतों को हम अपनी भुलादें तो जीना हमें फिर सुहाना लगेगा !! किसी की परस्तिश जो इतनी करोगे वो ख़ुद को समझने ख़ुदा ना लगेगा ? बदलती ही रहती है हर चीज़ ही जब तो ये प्यार भी कल पुराना लगेगा !! ये आसां नहीं है 'जेहद' शायरी भी इसे सीखने में ज़माना लगेगा !!      ~जावेद जेहद

खिले है ऐसे वो सुंदर गुलाब आहिस्ता आहिस्ता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 खिले है ऐसे वो सुंदर गुलाब आहिस्ता आहिस्ता कि चढ़ती जाए है जैसे शराब आहिस्ता आहिस्ता ये चढ़ते चाँद सूरज हों या खिलते फूल और कलियाँ कि आता है तो इनपर भी शबाब आहिस्ता आहिस्ता जो नाज़ुक हैं कली से भी हमेशा आप भी उनसे मिलो थोड़ी नज़ाकत से जनाब आहिस्ता आहिस्ता लगे है आग सीने में मोहब्बत की तो तेज़ी से बरसता है ये फिर क्यों प्यारा आब आहिस्ता आहिस्ता ये कैसे दुनिया वाले हैं जो इतनी अच्छी दुनिया को करे हैं होशियारी से ख़राब आहिस्ता आहिस्ता !! ज़रा ठहरो अभी तुम कुछ न बोलो जल्दबाज़ी में करो मेरी कला का तो हिसाब आहिस्ता आहिस्ता 'जेहद' ये तो ज़मीं प्यारी कहीं से होके अब हम तक चली आई मोहब्बत में जनाब आहिस्ता आहिस्ता !!         ~जावेद जेहद

कितनी करें और कब तलक जद्दोजहद..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 कितनी करें और कब तलक जद्दोजहद है जब ज़मीं से ता-फ़लक जद्दोजहद !! कर आख़िरी तू सांस तक जद्दोजहद है ज़िंदगी की ये चमक जद्दोजहद !! हर वक़्त सुब्ह-ओ-शाम तक जद्दोजहद क्या होगी इतनी भी अथक जद्दोजहद ? गर चूड़ियों की है खनक जद्दोजहद तो पायलों की भी छनक जद्दोजहद मेरी सही से कट रही है ज़िंदगी शायद सही की अब तलक जद्दोजहद साबित क़दम तू रहना मेरे साथ ही जाना कभी तू न बहक जद्दोजहद आता मज़ा है जाम तेरा पीने में भर-भर के तू हरदम छलक जद्दोजहद महरूम हैं जो कामयाबी से तिरी जीवन में उनके भी महक जद्दोजहद ये शायरी भी चाहे है मेहनत कड़ी इसमें 'जेहद' तो हो अथक जद्दोजहद     ~जावेद जेहद

कि हसरतें हैं इस क़दर..

   ताज़ा ग़ज़ल 💐 कि हसरतें हैं इस क़दर कि जाँ लगे है मुख़्तसर यहाँ तो मंज़िलें नहीं है रहगुज़र ही रहगुज़र वो कितनी ही नसीहतें गँवा चुकी हैं अब असर हमारी हिर्स ही हमें बना रही है जानवर बस अपनी राह देखते हैं आज के ये राहबर है और कोई भी नहीं बशर का ख़ौफ़ है बशर गले लगालूँ फिर उसे वो प्यार से मिले अगर जहाँ है फिर से घात में रहो हमेशा जाग कर 'जेहद' जहाँ को नाश के कहो न है तरक़्क़ी पर !    ~जावेद जेहद

दिल बहुत घबरा रहा है आजकल..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिल बहुत घबरा रहा है आजकल याद कोई  आ  रहा है आजकल ! जाने क्यों बहका हुआ है साक़िया लब से लब टकरा रहा है आजकल कल तलक जो भी यहाँ देखा नहीं वो समाँ दिखला रहा है आजकल नाम, शोहरत, माल-ओ-ज़र और ऐश का सबको ही ग़म  खा रहा है आजकल !! यूँ तो है वो सीधा-सादा सा मगर रंग क्या  दिखला रहा है आजकल जाने कब अच्छा ज़माना आएगा दिन बुरा ही आ रहा है आजकल कैसी-कैसी है मुसीबत आ रही होता क्या-क्या जा रहा है आजकल क्या वजह है ये जहाँ सारा 'जेहद' गर्दिशों में  आ रहा है आजकल !!      ~जावेद जेहद

न सिदाक़त रही न शराफ़त रही..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 न सिदाक़त रही न शराफ़त रही सिर्फ़ बाक़ी दिलों में सियासत रही कोई मजबूर कोई रज़ामंद है अब सलामत कहीं भी न इस्मत रही इज़्ज़तो-आबरू का ज़माना गया नाम की अब हमारी ये अज़मत रही जो हमारे लिए थे बुरे रहनुमा दुख है उनसे ही सबको ही क़ुर्बत रही क्यों नशे में हुकूमत के रहते हो चूर कब हमेशा किसी की हुकूमत रही फिर फ़सादों ने वीरां किया शह्र को रोकने की किसी में न हिम्मत रही हर तरफ़ है उदासी सी छाई 'जेहद' पहले सी अब कहाँ वो मुसर्रत रही     ~जावेद जेहद

प्यार का अब न कोई शेर सुनाया जाता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 प्यार का अब न कोई शेर सुनाया जाता इश्क़ का गीत भी दिल से नहीं गाया जाता सब ग़लत राहों की जानिब ही चले जाते हैं नेक राहों को तो हर कोई भुलाया जाता !! जो ज़माने को सही रास्ता दिखलाता चले अब तो ऐसा कोई साया भी न पाया जाता पहले दुख-दर्द में सब दौड़े चले आते थे अब ख़ुशी में भी किसी से नहीं आया जाता होता मंज़ूर जिसे ख़ुद वो खिंचा आता है राह-ए-हक़ पे कोई जबरन तो न लाया जाता राष्ट्र भाषा की अगर सच में हमें फ़िक्र है तो क्यों न घर-घर इसे अनिवार्य कराया जाता ? क्या ज़माने में सुकूँ, चैन-ओ-मुसर्रत थी कभी काश फिर इसको उसी हुस्न पे लाया जाता !! करता महसूस तो वो सीख भी ये जाता 'जेहद' प्यार पत्थर को भला कैसे सिखाया जाता ?      ~जावेद जेहद

कोई इस तरह मेरे पास आरहा है..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 कोई इस तरह मेरे पास आरहा है कि सीने से दिल ये चला जारहा है नशीली निगाहों का साग़र छलक के मिरे दिल को देखो न बहका रहा है जवाँ दो दिलों का ये पहला मिलन है समाँ जैसे सारा ही थर्रा रहा है !! महकने लगी है कली फूल बनके फ़लक उसपे शबनम सी बरसा रहा है चलो आज सुनते हैं चुपके से यारो ग़ज़ल कोई मेरी छुपा गा रहा है !! ये पल तो 'जेहद' कोई आफ़त करेगा कि इस पल नज़र कोई टकरा रहा है      ~जावेद जेहद

इश्क़ तेरा बड़ा है पाकीज़ा..

     " पालिका समाचार" उर्दू में प्रकाशित अपनी ये शुरूआती ग़ज़ल थोड़ी सी तबदीली के साथ..ये उसमें जमशेद अख़्तर नाम से छपी थी 💐 इश्क़ तेरा बड़ा है पाकीज़ा मेरे दिल को किया है पाकीज़ा तेरा चेहरा है चाँद सा रौशन और सर पे घटा है पाकीज़ा मुझको लगने दो बस मोहब्बत की ये हवा तो हवा है पाकीज़ा !! क्यों है इतनी ये हम में नापाकी जब हमारा ख़ुदा है पाकीज़ा !! लड़खड़ाने दो इश्क़ में मुझको इक यही तो नशा है पाकीज़ा चलो माना है गंदगी मुझ में तेरा क्या-क्या बता है पाकीज़ा मेरी पगड़ी भी उड़ गई पाकी तेरा सर भी खुला है पाकीज़ा क्यों न उसपे लुटाए जान 'जेहद' जो सदा ही रहा है पाकीज़ा !!      ~जावेद जेहद

हम जो मिलते तो क्या नहीं होता..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 हम जो मिलते तो क्या नहीं होता ये मगर  फ़ासला नहीं होता !! कहते फिरते सभी हमारे लिए जोड़ ये तो जुदा नहीं होता !! है ये कैसी तुम्हारी क़ैद सनम कोई इससे  रिहा नहीं होता ! अब अगर हम कभी मिलें न मिलें किसी को भी गिला नहीं होता !! बेमज़ा होती वो तो प्रेम कथा उसमें गर तीसरा नहीं होता ! उसे भी मिलता है मक़ाम बड़ा जो किसी काम का नहीं होता सारे अश्आर को सराहूं मैं क्यों शेर सारा भला नहीं होता !! शायरी कितनी लगती सीधी सी इसमें गर फ़लसफ़ा नहीं होता फ़ैसला आपका हमेशा ही क्यों किसी भी काम का नहीं होता ! दिल जिसे चाहता है वो तो 'जेहद' जैसा भी हो, बुरा नहीं होता !!      ~जावेद जेहद

टूटे-फूटे खंडरों में दिन बिताना याद है..

           ताज़ा ग़ज़ल 💐 टूटे-फूटे खंडरों में दिन बिताना याद है बंदरों सा हर घड़ी उद्धम मचाना याद है नदियों की धाराओं में अपने सभी यारों के संग मस्तियों में दूर तक बहते ही जाना याद है !! जो हमारे दस्तरस में भी नहीं थी उन दिनों उन उड़ानों के लिए भी फड़फड़ाना याद है देख कर कोई हसीना का हसीं हुस्न-ओ-जमाल उसके ख़्यालों में हसीं ग़ोते लगाना याद है !! एक ऐसा भी ज़माना था हमारा दोस्तो हर घड़ी रूमानी गाना गुनगुनाना याद है काम वो, जिनको मना करते थे जितना लोग सब उतना ही उस काम को करते ही जाना याद है !! लुक्का-चोरी, गिल्ली-डंडा, लड़ना-भिड़ना, छेड़-छाड़ सब उछलना-कूदना, गप्पेंं-लड़ाना याद है !! हर परब-त्योहार के आने से पहले ही 'जेहद' उसकी ख़ुशियों के नशे में डूब जाना याद है          ~जावेद जेहद

मोहब्बत पे आए कभी भी न आफ़त..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 मोहब्बत पे आए कभी भी न आफ़त रहे हर तरफ़ ही मोहब्बत सलामत !! दुआ है ख़ुदा की क़यामत से पहले न आए जहाँ में कोई भी क़यामत ! कोई भी हुकूमत जहाँ में बना के वो करता नहीं क्यों सही से हुकूमत सभी लूटते हैं जिसे मिलता मौक़ा ये कैसी है सेवा, ये कैसी है ख़िदमत सभी को सियासत का हिस्सा बना के ये भरते हो क्यों दिल में सबके सियासत ये दुनिया है क्यों उसका गुणगान करती जिसे भेजना चाहिए ख़ूब लानत !! समझते हो जिसको मिरी शायरी तुम हक़ीक़त में है ये अदब की अमानत ! लुटाओ 'जेहद' ख़ूब ग़ज़लें बना के लुटाने से इसमें तो होती है बरकत       ~जावेद जेहद

इश्क़ की मस्ती मिरी दुनिया-ओ-महफ़िल से गई..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 इश्क़ की मस्ती मिरी दुनिया-ओ-महफ़िल से गई चाँद आँखों से गया, चाँदनी इस दिल से गई !! प्यार की कश्ती जिसे पार लगाना था हमें डूबने लह्र में वो छूट के साहिल से गई !! कितने ही जिस्म निगल जाती हैं ये मौत-ओ-बला जान अपनी तो मगर प्यार के क़ातिल से गई !! जागता ही रहा कल रात मैं तो सुब्ह तलक याद आई जो तिरी फिर बड़ी मुश्किल से गई ज़िंदगी अब तो भटकती है किसी सहरा में सारी ख़ुशियाँ ही मिरी लेके वो महफ़िल से गई मैंने सोचा था बड़े चैन से मैं जी लूँगा अम्न और आशती पर सब मिरे शामिल से गई मिट गई अब तो 'जेहद' हर ख़ुशी की सारी चमक ज़िंदगी धुंध में होते हुए झिलमिल से गई !!       ~जावेद जेहद

कुछ अपने बारे में...

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     मेरे पिता अब्दुल क़्यूम साहब मरहूम सरकारी मुलाज़मत से रिटायर हुए और लगभग 10-12 साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए.. वालदा मोहतरमा उनसे भी बहुत पहले चल बसी थीं.. तीन भाई, तीन बहनों में सबसे बड़ा मैं.. मंझले मोहम्मद शारिक (SBI मैनेजर, इलाहाबाद)..छोटे मोहम्मद दानिश ज़ेरे-तालिम..और तीनों बहनेंं अपनी-अपनी ससुराल.. माँ-बाप की तरह सभी भाई-बहन निहायत नेक, मिलनसार, इबादतगुज़ार, परहेज़गार.. एक मैं ही बेकार निकल गया बैठ के शायरी करता रहता हूँ 😊        अदब से लगाव बचपन से था..लिखने का शौक़ जागा अपने समय की बेहद मक़बूल उर्दू पत्रिका "शमा" के अध्ययन से.. उसे पढ़ते पढ़ते उसमें छपने की अपनी भी ख़्वाहिश होने लगी..लेकिन जब लिखने लगा तो पत्रिका ही बंद हो गई.. तमन्ना अधूरी रह गई.. एक और अधूरी तमन्ना अच्छे उस्ताद की शागिर्दी की आज तक पूरी न हो सकी..शुरूआत में कुछ ग़ज़लें कुछ उस्तादों को दिखाई लेकिन हद से ज़्यादा उनका दौड़ाना मुझे रास नहीं आया.. और मैंने ठान लिया कि इस क्षेत्र में अब मुझे जो भी करना है, ख़ुद से ही करना है ।      मेरी पहली रचना (कहानी-गुमनाम जज़्बे) उर्दू ...

पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए उन्हें रौंद देते हैं नफ़रत के साए ।। शहर गांव जंगल, जवां बच्चे बूढ़े सभी पर हैं अब तो सियासत के साए कहीं पे तरक़्क़ी, कहीं भुखमरी है कहीं क़त्ल-ओ-ग़ारत, बग़ावत के साए भिखारी, सियाने, फ़रेबी, लुटेरे हैं कितनी तरह के हुकूमत के साए हाँ कुछ छांव देते हैं दुनिया में अच्छी सब अच्छे नहीं हैं हुकूमत के साए । जो ख़ुद को समझते बड़ी शान वाले हैं उनपे भी कुछ तो हिक़ारत के साए है दर्द-ओ-अलम की कड़ी धूप हर सू कहाँ छुप गए सब मुसर्रत के साए ? ये दुनिया हसीं है मगर हाए इसको अज़ल से हैं घेरे क़यामत के साए ग़ज़ल के बज़ारों में मंदी नहीं है भले ही हैं लुढ़के तिजारत के साए रहे उनपे रहमत ख़ुदा की 'जेहद' जी हैं जिनकी भी मुझपे मोहब्बत के साए     ~जावेद जेहद

अगर जान जाता कि क्या है ख़ुदाई..

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        ताज़ा ग़ज़ल 💐 अगर जान जाता कि क्या है ख़ुदाई तो करता  सभी की  सही रहनुमाई ख़ुदा ने  हसीं गर  है दुनिया बनाई तो हमने भी इसको बहुत है सजाई अजब हैं  वो ऊँची  क़दर वाले यारो जो करते हैं अपनी ही ख़ुद जगहँसाई अचानक ही क्यों भूल जाते हैं सारे वो एहसान सारा,  वो सारी वफ़ाई ख़ुदा वाले बनते तो क्या अच्छा होता ये क्यों पत्थरों से  वफ़ा आज़माई ? ये ज़ुल्म-ओ-सितम जग में चलते रहेंगे मगर अंत में है  ख़ुदाई-ख़ुदाई !! कभी होश में मैं तो लिखता रहा और कभी कोई रचना तो बेसुध बनाई !! ख़ुदा जब क़यामत को नाज़िल करेगा हाँ तब न चलेगी किसी की ख़ुदाई !! करें और कितनी वफ़ादारी तुमसे सदा ही तो हमने वफ़ा है निभाई ज़माना बुरा है ज़रा बचके रहिए कि सबकी 'जेहद' है इसी में भलाई                 ~जावेेद जेेेहद       करन सराय, सासाराम, बिहार      

है सफ़र दश्त-ए-बला का सोच ले..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 है सफ़र दश्त-ए-बला का सोच ले रास्ता कोई  बक़ा  का  सोच  ले । होगा क्या वादा वफ़ा का सोच ले बेवफ़ा है वो सदा का सोच  ले । सोचता हूँ ज़ीस्त का अंजाम मैं तू भी अपना दिन फ़ना का सोच ले आन में रहता है जो भी हर घड़ी होता क्या उसकी अना का सोच ले अपना रस्ता चलता जा तू ठीक है रुख़ किधर का है हवा का सोच ले हद से ज़्यादा अब न रख उम्मीद तू काम क्या है रहनुमा का सोच ले !! ज़ुल्म की आँधी जो यूँ चलती रही होगा क्या शह्र-ए-वफ़ा का सोच ले इस क़दर हम जो परेशाँ हाल हैं मामला क्या है सज़ा का सोच ले फ़िक्र दुनिया की 'जेहद' तू छोड़ दे काम अब उसकी रज़ा का सोच ले        ~जावेद जहद