फिर ख़िज़ाँ छाने लगी, बढ़ने लगा है दर्द फिर..
ताज़ा ग़ज़ल
फिर ख़िज़ाँ छाने लगी, बढ़ने लगा है दर्द फिर
लेके आया है ये मौसम अपना चेहरा ज़र्द फिर
फिर से हावी हो गई हैवानियत चारों तरफ़
सारी बातें पड़ गईंं इंसानियत की सर्द फिर
फीकी-फीकी सारी मस्ती, सारी महफ़िल बेचमक
ज़िंदगी की हर ख़ुशी पे जम रही है गर्द फिर !!
औरतें ही राह में जब गुल खिलाती फिर रहीं
तो बिचारे क्या करें ये, मर्द तो हैं मर्द फिर !!
एकता की बात थी, सब एक होने आए थे
जाने फिर क्यों लड़ पड़े सब आपसों में फ़र्द फिर
उठ रहा है प्यार से उसका क़दम फिर से 'जहद'
लगता है वो आ रहा है दिल को देने दर्द फिर !!
जावेद जहद
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