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एक ही ज़मीन में तीन ग़ज़लें..

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      1_ग़ज़ल ज़िंदगी में है इंतिशार बहुत मिलेगा कैसे फिर क़रार बहुत जाने कैसे ये आ गई ख़ुश्की फल वफ़ा के थे आबदार बहुत हमें तो आपसे है बैर नहीं आप ही को मगर है खार बहुत दिल, जिगर, रूह तक असर इसका इस क़लम की है तेज़ धार बहुत !! मौज ग़ज़लों की भाई क्या कहना इस नदी के हैं आबशार बहुत !! क्या पता उसको मेरा है कितना है मुझे जिसका इंतज़ार बहुत !! इन दिनों कोई मुझसे रूठा है इन दिनों हूँ मैं सोगवार बहुत मेहनती लोगों के लिए जग में हर जगह ही हैं रोज़गार बहुत उसकी पिक्चर में बस तशद्दुद था कर गई कैसे कारोबार बहुत ?? मैं जलाऊंगा क्या तुम्हें जानम तुम तो ख़ुद ही हो शोलाबार बहुत शायरी अपनी भी लो मश्क़ी से बन गई देखो पायदार बहुत !! बन न पाए जो दिन हसीन 'जहद' तो शब-ए-ग़म को ही सँवार बहुत **************************      2_ग़ज़ल जब जहाँ में भरा था प्यार बहुत वो ज़माना था शानदार बहुत !! अब तो गिनती के रह गए जैसे अबसे पहले थे बा-वक़ार बहुत अब के ऐसी घटी हैं घटनाएं अब के दुनिया है शर्मसार बहुत जब हमारी थी ज़िंदगी फ़ितरी तब हक़ीक़त में था क़रार बहुत वो जिसे चाहे ख़ाक कर डाले उसका जलवा है शोलाबार बहुत पश्...