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स्वच्छ फ़िज़ा सिंगार बिना..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 स्वच्छ फ़िज़ा सिंगार बिना बाग़ खिले न बहार बिना ! आँख हो नीली या काली फीकी लगे है ख़ुमार बिना प्यार ही प्यार है कैसा प्यार प्यार है क्या तकरार बिना लाख हुनर हो हाथों में होगा क्या औज़ार बिना किसको मिला है सुख-सागर दुख की नदी किए पार बिना उसकी नाव तो डूबे गी बह गया जो पतवार बिना बेजा है ये सब गुलपोशी उनकी वफ़ा के हार बिना प्यार से वो क्या समझेगा सुधरे नहीं जो मार बिना कुछ भी नहीं इंसान 'जहद' प्यार, वफ़ा, ईसार बिना !!    ~ जावेद जहद