सारा गुलशन ही बिखर जाए बहुत मुमकिन है..

       ताज़ा ग़ज़ल

सारा गुलशन ही बिखर जाए बहुत मुमकिन है
ऐसा तूफ़ान ये कर जाए बहुत मुमकिन है !!

देख कर तेरी घनी ज़ुल्फ़ का ये साया घना
कोई दीवाना ठहर जाए बहुत मुमकिन है !

फिर नज़र आई वो बिजली सी गिराती बुलबुल
फिर कोई इश्क़ में मर जाए बहुत मुमकिन है !

इस क़दर ख़ौफ़ का आलम है कि अब तो कोई
अपने ही साए से डर जाए बहुत मुमकिन है !!

ज़ह्र-आलूद फ़ज़ाओं का बशर अब यारो
एक ठोकर में ही मर जाए बहुत मुमकिन है

घर की बदहाली से फिर कोई परेशां होकर
आज फिर दूर शहर जाए बहुत मुमकिन है

देखते-देखते ये ज़ुल्म-ओ-सितम दिल मेरा
इस भरी दुनिया से भर जाए बहुत मुमकिन है

ऐसे हालात में तेवर ही बदल ले ये 'जेहद'
और ग़ज़ल आग से भर जाए बहुत मुमकिन है

      ~ जावेद जहद

Comments

Popular posts from this blog

जब बुरे दिन उमड़ने लगते हैं..

न पूछो ग़ज़ल से मुझे क्या मिला है..

जावेद जहद की पाँच ग़ज़लें..