अँधेरी रात में हमने तो रौशनी की है..

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अँधेरी रात में हमने तो रौशनी की है
भटकती राह से महफ़ूज़ ज़िंदगी की है

वो मेरी ज़िंदगी में इस तरह चला आया
कि काली रात में हल जैसे चाँदनी की है

किसी का ख़्याल नहीं है, किसी की फ़िक्र नहीं
जिसे भी देखो पड़ी अपनी ज़िंदगी की है !!

बुराई बढ़ गई, ये बात कह रहे हैं सभी
मगर जो देखो तो करनी वही सभी की है

फ़साद, जंग, तशद्दुद, फ़रेब, धोखाधड़ी
न जाने कौन सी आदत ये आदमी की है

मिटेगी कैसे ये ग़ैरों की दुश्मनी हम से
जब अपने लोगों से ही हमने दुश्मनी की है

ये उनके रुख़ पे जो फैली है शादमानी 'जहद'
ये मेरे प्यार की, मेरी ही आशिक़ी की है !!

       ~ जावेद जहद

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