इक कली फिर खिल उठी बोसे लिए..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 इक कली फिर खिल उठी बोसे लिए और गुल सी बन गई बोसे लिए !! एक बोसे के लिए हम सोचते उसने झटके में कई बोसे लिए रख दिया क्या हमने उसपे प्यार से वो जबीं सोई रही बोसे लिए !! बोसा लेते ही वो सपनों की परी लाज से फिर उड़ गई बोसे लिए इस क़दर बोसों से उसको प्यार था वो बिदा जब भी हुई बोसे लिए !! क्या मुसीबत है वो सोई बोसे से और उठी भी तो उठी बोसे लिए गालों पर क्यों छाप लेकर आते हो फिरता है ऐसे कोई बोसे लिए ? मीठे-मीठे लग रहे हो तुम बड़े आ रहे हो क्या अभी बोसे लिए साथ हम तो झूमे-नाचे प्यार में और कभी झगड़े, कभी बोसे लिए दुनिया वालों ने लब-ओ-रुख़सार क्या कितने ही क़दमों के भी बोसे लिए !! नाज़ुकी को देख कर उसकी 'जहद' जब लिए तो मख़मली बोसे लिए !! ~जावेद जहद