शाम-ओ-सहर,रोज़-ओ-शब चाहा..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐

शाम-ओ-सहर, रोज़-ओ-शब चाहा
कम इससे तुझको कब चाहा !!

हद से ज़्यादा, ख़ुद से बढ़ के
तेरा ही नाम-ओ-नसब चाहा

कोई ग़ुल न किया न शोर किया
चुपके से तुझे ब-अदब चाहा !!

तूने तो चाहा कोई ग़रज़ से
और मैंने तुझे बे-सबब चाहा

हर वक़्त ही तेरी ख़्वाहिश की
हर वक़्त ही ऐश-ओ-तरब चाहा

कब से जो मुझपे मरता रहा
मैंने उसे जाके अब चाहा !!

दो-दो चेहरा रखने वाला
क्या यार भी मैंने अजब चाहा

सारे हुनर को छोड़ 'जेहद' जी
मैंने तो बस ये अदब चाहा !!

   ~ जावेद जहद

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