चारों ही तरफ़ वक़्त की अँगड़ाइयाँ मिलीं..
ताज़ा ग़ज़ल 💐 चारों ही तरफ़ वक़्त की अँगड़ाइयाँ मिलीं हर राह में नई-नई तबदीलियाँ मिलीं !! दिल को मिरे कहीं भी न तन्हाइयाँ मिलीं तन्हाई में भी उनकी ही परछाइयाँ मिलीं औरों की भी इनायतें मुझ पे हुईं मगर तुझ सी किसी में भी न वफ़ादारियाँ मिलीं करने से ऐश कुछ तो सुकूँ मिल गया मुझे दिल को मगर तो और भी बेचैनियाँ मिलीं मँगाइयाँ तो नाम की ही झोंपड़ों में थीं महलों के आस-पास ही मँगाइयाँ मिलीं पूछो न मुझसे अब मिरी परवाज़ है कहाँ जबसे हैं मेरी फ़िक्र को गहराइयाँ मिलीं कहने को हम तो हो गए आज़ाद हैं 'जेहद' लगता नहीं हमें अभी आज़ादियाँ मिलीं !! ~जावेद जेहद