ज़ुल्म के पत्थर बरस रहे हैं सर के हमारे पास मुसलसल..

          ताज़ा ग़ज़ल

ज़ुल्म के पत्थर बरस रहे हैं सर के हमारे पास मुसलसल
और हम बैठे देख रहे हैं बेहिस, बे-हस्सास मुसलसल !!

आग लगी है मेरे मन में कैसी अब के ये मत पूछो
चारों तरफ़ है जलता सहरा और मिरी ये प्यास मुसलसल

आया करती थीं ख़ुश्बूएं दुनिया को महकाने जहाँ से
आती है अब उसी जगह से जुर्म-ओ-गुनह की बास मुसलसल

सोज़-ओ-ग़म से, दर्द-ओ-अलम से नम हैं निगाहें कबसे हमारी
और उधर मस्ती की महफ़िल, ख़ुशियों के इजलास मुसलसल

मेरे घर भी ख़ुशियों की बरसात करेंगे इक दिन खुल के
मुझको ख़ुदाया, ख़ुशहालों से कैसी है ये आस मुसलसल

जितना उनको भुलाना चाहा, वो और भी याद मुझे आए 'जहद'
उनके ग़म का तंहाई में बढ़ता गया एहसास मुसलसल !!

         ~ जावेद जहद

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