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मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है यानी तू आज भी बसी मेरी नज़र में है छूकर इन्हें भी जैसे छू लेता हूँ मैं तुझे तेरा ही लम्स तो मिरे दीवार-ओ-दर में है तू ही बता कि बिन तिरे इन सब का क्या करूँ दिल में जो जुनूँ मिरे, सौदा जो सर में है !! तेरे बिना भी मैं तो मगन रहता हूँ सनम तुम सा ही लुत्फ़ ये तिरे ख़्याल-ए-सेहर में है हुस्न-ओ-जमाल की तिरे तारीफ़ क्या करूँ तू आसमां के इन हसीं शम्स-ओ-क़मर में है मेरी कला में कुछ तो बला का जमाल है और कुछ कमाल आपके हुस्न-ए-नज़र में है अम्न-ओ-अमान, प्यार-वफ़ा की क़दर करो ये शै बड़े ही क़ीमती लाल-ओ-गुहर में है !! कोई भी काम हो तो समझदारियों से हो होता बड़ा अनर्थ ज़रा सी कसर में है !! कहती है दुनिया मेरा हर इक शेर देख के ये तो 'जेहद' सुख़न के बड़े जादूगर में है        ~जावेद जहद