सागर मिला कहीं पे तो साग़र कहीं मिला..
ताज़ा ग़ज़ल सागर मिला कहीं पे तो साग़र कहीं मिला मुझको थी प्यास जिसकी कहीं वो नहीं मिला आता नहीं पसंद नज़र को किसी का रूप मुझको क़सम से यार ही ऐसा हसीं मिला वो पा गया हमारी तो सारी ही चाहतें जब भी ख़ुलूस से मुझे कोई कहीं मिला देता है धमकी और भगाता भी है नहीं मुझको न जाने कैसा ये मेरा मकीं मिला तब उसकी और भी मुझे यादें सता गईंं जब उसके जैसा ही मुझे कोई हसीं मिला पूरी तरह से किसको मिला है यहाँ 'जहद' जिसको मिला है चैन तो ज़ेर-ए-ज़मीं मिला ~ जावेद जहद