जब तलक साथ रहा ख़ूब रहा..

        #ताज़ा_ग़ज़ल 💐

जब तलक साथ रहा ख़ूब रहा
फिर कहीं दूर ही महबूब रहा 

जाने क्यों दर्द-ए-जिगर देने को
मेरा ही दिल उसे मतलूब रहा

क्या पता कब वो समाया दिल में
कब नज़र मिलते ही मैं डूब रहा

दूर तक तन्हा कभी राहों में
यूँ ही चलना भी बहुत ख़ूब रहा

जब कभी याद वो आया तो मिरा
ग़म में दिल देर तलक डूब रहा

उसकी नज़रों में सभी प्यारे थे
अपना किरदार ही मायूब रहा

हर तरह के ही ग़ज़ल में अपनी
रंग भरना भी बहुत ख़ूब रहा

कुछ है चीज़ों में नई दिलचस्पी
और कुछ चीज़ों से दिल ऊब रहा

जितना है शेर-ओ-सुख़न आज मुझे
इतना तो पहले न मरग़ूब रहा

कुछ ग़ज़ल ऐसी कहो लोग कहें
ये हुनर तुमसे भी मंसूब रहा

कुछ न आता था 'जहद' पर ये ग़ज़ल
ख़ूब कहना भी बहुत ख़ूब रहा !!

     ~ जावेद जहद

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