दिन-ब-दिन और भी ये बिगड़े गी..
ताज़ा ग़ज़ल
दिन-ब-दिन और भी ये बिगड़े गी
इस जहाँ की फ़िज़ा न सुधरे गी !
ये बदी आज तक किसी से जब
रुक न पाई तो किस से ठहरे गी
आज ग़मगीन सा नज़ारा है
कुछ बला तो ज़रूर गुज़रे गी
सब उसे नेक मान बैठे थे
किसने सोचा कभी वो झगड़े गी
मुंजमिद सी है प्यार की धारा
जाने कब टूट कर ये उमड़े गी
बे-अमाँ दह्र जब दमकती है
अम्न हो तो ये और निखरे गी
ज़िंदगी का मज़ा तो देख लिया
देखें अब मौत कैसे जकड़े गी
अभी नफ़रत भरी है चारों तरफ़
कभी उलफ़त भी ज़ोर पकड़े गी
आह ! तब न रहेगा कुछ बाक़ी
रोज़-ए-महशर जो दह्र उजड़े गी
ये कभी ख़त्म न 'जहद' होगी
ज़िंदगी फिर कहीं पे गुज़रे गी
जावेद जहद
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