उलफ़त का फूल अब सही से खिल नहीं रहा..
#ताज़ा_ग़ज़ल 💐
उलफ़त का फूल अब सही से खिल नहीं रहा
पूरी तरह से दिल किसी का मिल नहीं रहा
वो दौर भी तो अब मुझे हासिल नहीं रहा
ये दौर भी तो अब मिरे क़ाबिल नहीं रहा
हर शख़्स है परेशाँ ज़माने में आज कल
ये अपनी भूल का तो सिला मिल नहीं रहा
शर्म-ओ-हया, मोहब्बत-ओ-ईसार-ओ-आबरू
किस-किस का ये जहान भी क़ातिल नहीं रहा
दंगा-फ़साद, झगड़ा, लड़ाई व छल-कपट
इनमें बताओ कौन है शामिल नहीं रहा ?
दुनिया की हर ख़ुशी को मिटाने चला था जो
दुनिया में अब तो लो वही क़ातिल नहीं रहा
इल्म-ओ-हुनर, ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत की जोत से
किस दौर में जहान ये झिलमिल नहीं रहा ?
बेताबी, बेक़रारी, तड़प, दर्द के सिवा
हाँ और कुछ तो इश्क़ में हासिल नहीं रहा
मानेगा कौन ये जो बता दे भी दिल अगर
किसको भुलाया, किस से ये ग़ाफ़िल नहीं रहा
हर शय यहाँ से होके गुज़र जाती है कहीं
कोई भी चीज़ का यहाँ साहिल नहीं रहा
मश्क़-ए-सुख़न है इतना किया मैंने तो 'जहद'
मुश्किल सुख़न भी अब मुझे मुश्किल नहीं रहा
#जावेद_जहद
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