ग़ालिब है आदमी पर आवारगी सदा से..

        ताज़ा ग़ज़ल

ग़ालिब है आदमी पर आवारगी सदा से
कैसे बचेंगे फिर हम संसार में ख़ता से

ईमां-परस्त हैं जो क़ल्ब-ओ-जिगर, अदा से
डरते नहीं हैं हरगिज़ वो कोई भी बला से !!

क्या ज़ौक़-ओ-शौक़ थे वो लोगों के कल तलक जी
जो होके रह गए हैं इस दौर में फ़ना से !!

साहिर भी रहते होंगे बेबस कहीं-कहीं पे
हर चीज़ पर न जादू चलता सही तरह से

दुनिया में दबदबा है आतिश का आजकल तो
शोला बरस रहा है हर वक़्त हर दिशा से !!

उलफ़त की राह में तो घायल हुए कभी हम
सौदा हुआ कभी और बस हो गए फ़ना से !

अब कारवाँ को रस्ता कैसे दिखाए रहबर
भटका हुआ है ख़ुद वो अपने ही रास्ता से

दिल से जो शाद होगा इस दौर में ज़रा भी
समझो वो बच गया फिर हर रोग हर बला से

मोमिन की चाहतों का मुझपर तो फ़ैज़ है ही
महरूम मैं नहीं हूँ औरों की भी वफ़ा से !!

सोए रहोगे आख़िर कबतक ख़मोशी ताने
कबतक नहीं जगो गे अंदर की तुम सदा से

तुम तो न राहबर हो, न मीर-ए-कारवां हो
फिर किस लिए 'जहद' तुम बनते हो रहनुमा से

        ~ जावेद जहद

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