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दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश वैसी ही हूबहू है मिरे यार की कशिश !! होती है उतनी ही तो वफ़ा-प्यार की कशिश मद्धम की हो या चाहे ये बौछार की कशिश जिसको पसंद आ गई घर-द्वार की कशिश भाती नहीं है फिर उसे बाज़ार की कशिश अब पूछिए न मुझमें कशिश कितनी है जनाब ये दुनिया जानती है क़लमकार की कशिश !! बनना है पुर-कशिश तो सभी अपनी ज़ात में पैदा करो मोहब्बत-ओ-ईसार की कशिश !! सारे जहाँ को उसने दिवाना बना लिया देखो तो उस सियाने अदाकार की कशिश होगी किसी को चाह किसी हूर की 'जेहद' अपने लिए तो बस वही रुख़सार की कशिश        ~जावेद जेहद

खिले है ऐसे वो सुंदर गुलाब आहिस्ता आहिस्ता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 खिले है ऐसे वो सुंदर गुलाब आहिस्ता आहिस्ता कि चढ़ती जाए है जैसे शराब आहिस्ता आहिस्ता ये चढ़ते चाँद सूरज हों या खिलते फूल और कलियाँ कि आता है तो इनपर भी शबाब आहिस्ता आहिस्ता जो नाज़ुक हैं कली से भी हमेशा आप भी उनसे मिलो थोड़ी नज़ाकत से जनाब आहिस्ता आहिस्ता लगे है आग सीने में मोहब्बत की तो तेज़ी से बरसता है ये फिर क्यों प्यारा आब आहिस्ता आहिस्ता ये कैसे दुनिया वाले हैं जो इतनी अच्छी दुनिया को करे हैं होशियारी से ख़राब आहिस्ता आहिस्ता !! ज़रा ठहरो अभी तुम कुछ न बोलो जल्दबाज़ी में करो मेरी कला का तो हिसाब आहिस्ता आहिस्ता 'जेहद' ये तो ज़मीं प्यारी कहीं से होके अब हम तक चली आई मोहब्बत में जनाब आहिस्ता आहिस्ता !!         ~जावेद जेहद

कि हसरतें हैं इस क़दर..

   ताज़ा ग़ज़ल 💐 कि हसरतें हैं इस क़दर कि जाँ लगे है मुख़्तसर यहाँ तो मंज़िलें नहीं है रहगुज़र ही रहगुज़र वो कितनी ही नसीहतें गँवा चुकी हैं अब असर हमारी हिर्स ही हमें बना रही है जानवर बस अपनी राह देखते हैं आज के ये राहबर है और कोई भी नहीं बशर का ख़ौफ़ है बशर गले लगालूँ फिर उसे वो प्यार से मिले अगर जहाँ है फिर से घात में रहो हमेशा जाग कर 'जेहद' जहाँ को नाश के कहो न है तरक़्क़ी पर !    ~जावेद जेहद

दिल बहुत घबरा रहा है आजकल..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 दिल बहुत घबरा रहा है आजकल याद कोई  आ  रहा है आजकल ! जाने क्यों बहका हुआ है साक़िया लब से लब टकरा रहा है आजकल कल तलक जो भी यहाँ देखा नहीं वो समाँ दिखला रहा है आजकल नाम, शोहरत, माल-ओ-ज़र और ऐश का सबको ही ग़म  खा रहा है आजकल !! यूँ तो है वो सीधा-सादा सा मगर रंग क्या  दिखला रहा है आजकल जाने कब अच्छा ज़माना आएगा दिन बुरा ही आ रहा है आजकल कैसी-कैसी है मुसीबत आ रही होता क्या-क्या जा रहा है आजकल क्या वजह है ये जहाँ सारा 'जेहद' गर्दिशों में  आ रहा है आजकल !!      ~जावेद जेहद

प्यार का अब न कोई शेर सुनाया जाता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 प्यार का अब न कोई शेर सुनाया जाता इश्क़ का गीत भी दिल से नहीं गाया जाता सब ग़लत राहों की जानिब ही चले जाते हैं नेक राहों को तो हर कोई भुलाया जाता !! जो ज़माने को सही रास्ता दिखलाता चले अब तो ऐसा कोई साया भी न पाया जाता पहले दुख-दर्द में सब दौड़े चले आते थे अब ख़ुशी में भी किसी से नहीं आया जाता होता मंज़ूर जिसे ख़ुद वो खिंचा आता है राह-ए-हक़ पे कोई जबरन तो न लाया जाता राष्ट्र भाषा की अगर सच में हमें फ़िक्र है तो क्यों न घर-घर इसे अनिवार्य कराया जाता ? क्या ज़माने में सुकूँ, चैन-ओ-मुसर्रत थी कभी काश फिर इसको उसी हुस्न पे लाया जाता !! करता महसूस तो वो सीख भी ये जाता 'जेहद' प्यार पत्थर को भला कैसे सिखाया जाता ?      ~जावेद जेहद

कोई इस तरह मेरे पास आरहा है..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 कोई इस तरह मेरे पास आरहा है कि सीने से दिल ये चला जारहा है नशीली निगाहों का साग़र छलक के मिरे दिल को देखो न बहका रहा है जवाँ दो दिलों का ये पहला मिलन है समाँ जैसे सारा ही थर्रा रहा है !! महकने लगी है कली फूल बनके फ़लक उसपे शबनम सी बरसा रहा है चलो आज सुनते हैं चुपके से यारो ग़ज़ल कोई मेरी छुपा गा रहा है !! ये पल तो 'जेहद' कोई आफ़त करेगा कि इस पल नज़र कोई टकरा रहा है      ~जावेद जेहद

हम जो मिलते तो क्या नहीं होता..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 हम जो मिलते तो क्या नहीं होता ये मगर  फ़ासला नहीं होता !! कहते फिरते सभी हमारे लिए जोड़ ये तो जुदा नहीं होता !! है ये कैसी तुम्हारी क़ैद सनम कोई इससे  रिहा नहीं होता ! अब अगर हम कभी मिलें न मिलें किसी को भी गिला नहीं होता !! बेमज़ा होती वो तो प्रेम कथा उसमें गर तीसरा नहीं होता ! उसे भी मिलता है मक़ाम बड़ा जो किसी काम का नहीं होता सारे अश्आर को सराहूं मैं क्यों शेर सारा भला नहीं होता !! शायरी कितनी लगती सीधी सी इसमें गर फ़लसफ़ा नहीं होता फ़ैसला आपका हमेशा ही क्यों किसी भी काम का नहीं होता ! दिल जिसे चाहता है वो तो 'जेहद' जैसा भी हो, बुरा नहीं होता !!      ~जावेद जेहद

टूटे-फूटे खंडरों में दिन बिताना याद है..

           ताज़ा ग़ज़ल 💐 टूटे-फूटे खंडरों में दिन बिताना याद है बंदरों सा हर घड़ी उद्धम मचाना याद है नदियों की धाराओं में अपने सभी यारों के संग मस्तियों में दूर तक बहते ही जाना याद है !! जो हमारे दस्तरस में भी नहीं थी उन दिनों उन उड़ानों के लिए भी फड़फड़ाना याद है देख कर कोई हसीना का हसीं हुस्न-ओ-जमाल उसके ख़्यालों में हसीं ग़ोते लगाना याद है !! एक ऐसा भी ज़माना था हमारा दोस्तो हर घड़ी रूमानी गाना गुनगुनाना याद है काम वो, जिनको मना करते थे जितना लोग सब उतना ही उस काम को करते ही जाना याद है !! लुक्का-चोरी, गिल्ली-डंडा, लड़ना-भिड़ना, छेड़-छाड़ सब उछलना-कूदना, गप्पेंं-लड़ाना याद है !! हर परब-त्योहार के आने से पहले ही 'जेहद' उसकी ख़ुशियों के नशे में डूब जाना याद है          ~जावेद जेहद

पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 पनपते हैं जब भी मोहब्बत के साए उन्हें रौंद देते हैं नफ़रत के साए ।। शहर गांव जंगल, जवां बच्चे बूढ़े सभी पर हैं अब तो सियासत के साए कहीं पे तरक़्क़ी, कहीं भुखमरी है कहीं क़त्ल-ओ-ग़ारत, बग़ावत के साए भिखारी, सियाने, फ़रेबी, लुटेरे हैं कितनी तरह के हुकूमत के साए हाँ कुछ छांव देते हैं दुनिया में अच्छी सब अच्छे नहीं हैं हुकूमत के साए । जो ख़ुद को समझते बड़ी शान वाले हैं उनपे भी कुछ तो हिक़ारत के साए है दर्द-ओ-अलम की कड़ी धूप हर सू कहाँ छुप गए सब मुसर्रत के साए ? ये दुनिया हसीं है मगर हाए इसको अज़ल से हैं घेरे क़यामत के साए ग़ज़ल के बज़ारों में मंदी नहीं है भले ही हैं लुढ़के तिजारत के साए रहे उनपे रहमत ख़ुदा की 'जेहद' जी हैं जिनकी भी मुझपे मोहब्बत के साए     ~जावेद जेहद

अगर जान जाता कि क्या है ख़ुदाई..

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        ताज़ा ग़ज़ल 💐 अगर जान जाता कि क्या है ख़ुदाई तो करता  सभी की  सही रहनुमाई ख़ुदा ने  हसीं गर  है दुनिया बनाई तो हमने भी इसको बहुत है सजाई अजब हैं  वो ऊँची  क़दर वाले यारो जो करते हैं अपनी ही ख़ुद जगहँसाई अचानक ही क्यों भूल जाते हैं सारे वो एहसान सारा,  वो सारी वफ़ाई ख़ुदा वाले बनते तो क्या अच्छा होता ये क्यों पत्थरों से  वफ़ा आज़माई ? ये ज़ुल्म-ओ-सितम जग में चलते रहेंगे मगर अंत में है  ख़ुदाई-ख़ुदाई !! कभी होश में मैं तो लिखता रहा और कभी कोई रचना तो बेसुध बनाई !! ख़ुदा जब क़यामत को नाज़िल करेगा हाँ तब न चलेगी किसी की ख़ुदाई !! करें और कितनी वफ़ादारी तुमसे सदा ही तो हमने वफ़ा है निभाई ज़माना बुरा है ज़रा बचके रहिए कि सबकी 'जेहद' है इसी में भलाई                 ~जावेेद जेेेहद       करन सराय, सासाराम, बिहार      

है सफ़र दश्त-ए-बला का सोच ले..

       ताज़ा ग़ज़ल 💐 है सफ़र दश्त-ए-बला का सोच ले रास्ता कोई  बक़ा  का  सोच  ले । होगा क्या वादा वफ़ा का सोच ले बेवफ़ा है वो सदा का सोच  ले । सोचता हूँ ज़ीस्त का अंजाम मैं तू भी अपना दिन फ़ना का सोच ले आन में रहता है जो भी हर घड़ी होता क्या उसकी अना का सोच ले अपना रस्ता चलता जा तू ठीक है रुख़ किधर का है हवा का सोच ले हद से ज़्यादा अब न रख उम्मीद तू काम क्या है रहनुमा का सोच ले !! ज़ुल्म की आँधी जो यूँ चलती रही होगा क्या शह्र-ए-वफ़ा का सोच ले इस क़दर हम जो परेशाँ हाल हैं मामला क्या है सज़ा का सोच ले फ़िक्र दुनिया की 'जेहद' तू छोड़ दे काम अब उसकी रज़ा का सोच ले        ~जावेद जहद