रह-रह के आज मुझको पानी सरक रहा है..

        ताज़ा ग़ज़ल

रह-रह के आज मुझको पानी सरक रहा है
मुझको वो याद करके शायद सिसक रहा है

कोई ख़ुशी नहीं है, हाँ ग़म ज़रूर है जी
जब ही तो ये क़फ़स का पंछी चहक रहा है

यारब मिरा वो सपना हो जाता सच कभी तो
देखा था जिसमें सारा गुलशन चहक रहा है

दुनिया की शक्ल-ओ-सूरत चमके तो कैसे यारो
अंधी डगर में जब ये आलम भटक रहा है !!

यूँ हावी हो गया है शैतान इस जहाँ पर
हर-हर क़दम पे अब तो इंसांं बहक रहा है

माँ-बाप हों या बच्चे, महबूब हो या साथी
कोई किसी के शामिल याँ कब तलक रहा है

गुमनाम मैं कभी था, लेकिन 'जहद' ये अब तो
कितना सुख़न में अपना चेहरा चमक रहा है !

        ~ जावेद जहद

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