ज़माना है बुरा, सरकार से भी कुछ नहीं होता..
ताज़ा ग़ज़ल ज़माना है बुरा, सरकार से भी कुछ नहीं होता किसी को डर ख़ुदा की मार से भी कुछ नहीं होता भला, मेहर-ओ-वफ़ा, ईसार से भी कुछ नहीं होता कि अब तो आजज़ी और प्यार से भी कुछ नहीं होता वो न चाहे अगर तो उसके दिल में फिर किसी सूरत हज़ारों प्यार के इज़हार से भी कुछ नहीं होता !! वो बाँहों में चला आए तो फिर कुछ बन ही आता है फ़क़त महबूब के दीदार से भी कुछ नहीं होता !! जो होना हो अगर तो प्यार से भी हो ही जाता है नहीं तो तोप से तलवार से भी कुछ नहीं होता !! ये मुमकिन है ग़ज़ल मेरी सधारण सी ही लाए रंग असर लोगों में अब मेआर से भी कुछ नहीं होता ! किसी मुफ़लिस ने जबसे मुफ़लिसी से दिल लगाया है उसे ज़र-माल के अम्बार से भी कुछ नहीं होता !! उजड़ जाए किसी के दिल के गुलशन की जो शादाबी उसे फिर रौनक़-ए-गुलज़ार से भी कुछ नहीं होता !! ये बातें हैं उसूलों और मिज़ाजों की 'जहद' अपने कि मेरा दिल ख़फ़ा अग़यार से भी कुछ नहीं होता जावेेद जहद