वहशी हैं इतने लोग यहाँ, इंसानों की बस्ती में..

      ताज़ा ग़ज़ल

वहशी हैं इतने लोग यहाँ, इंसानों की बस्ती में
कि लगता है रहते हैं हम तो हैवानों की बस्ती में

उलटी-सीधी बातें हैं अब विद्वानों की बस्ती में
खो गई सारी दानाई क्या, नादानों की बस्ती में

आज जो हालत है जग की बर्बाद ही सबकुछ हो जाता
ये अच्छा है इंसान हैं कुछ, शैतानों की बस्ती में !!

एक हमें ग़म देता है पास हमारे बैठे-बैठे
और एक मसीहा रहता है अंजानों की बस्ती में

ख़ाक हुए हर ख़्वाब ही जैसे मेरे दिल की दुनिया के
किसने है ये आग लगाई अरमानों की बस्ती में ?

या तो ग़म की बात है कोई, या ख़ुशियों का राज़ कोई
झूम रही है सारी दुनिया मयख़ानों की बस्ती में !!

हैं मेरे दिल में कैसी-कैसी ख़्वाहिशें किस से बोलूँ
सब मेरे अपने रहते हैं बेगानों की बस्ती में !!

ऐ मेरे सनम दे होश मुझे, जीने का दे जोश मुझे
वर्ना यहाँ से ले चल मुझे तू दीवानों की बस्ती में

प्यार, वफ़ा के फूल खिलाएं और कलियां मोहब्बत की 'जहद'
रक़्स-कुनां हों फिर से ख़ुशियाँ वीरानों की बस्ती में !!

       ~ जावेद जहद

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