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दुनिया थोड़ा डर गई है..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐 दुनिया थोड़ा डर गई है ये न समझो मर गई है ख़ुद को गड्ढे में गिरा के तुमको ऊँचा कर गई है स्वछ्य होता ही नहीं जग गंदगी यूँ भर गई है !! गुमरही की तेज़ आंधी सबको अंधा कर गई है सोच कब बदलेगी जाने दिल में घर जो कर गई है चीज़-ए-बाहर घर में आई घर की शय बाहर गई है ! भावना बदले की आख़िर काम अपना कर गई है !! कुछ ग़लत अपनी ही हरकत हाल ख़स्ता कर गई है !! झूमता रहता है ये दिल यूँ नशा वो भर गई है ! पहले मैं जिससे अड़ा था अब वो मुझसे अड़ गई है जबसे वो बिछड़ी है मुझसे सारी मस्ती मर गई है !! शायरी अब अपनी यारो हद से ज़्यादा बढ़ गई है पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा सब्ज़ बारिश कर गई है ख़्वास होगी वो यक़ीनन बात जो घर-घर गई है !! कोई न पूछे 'जेहद' जब समझो रचना सड़ गई है      ~जावेद जहद

किसी के लिए दिल की धड़कन सी माँ है..

           ताज़ा ग़ज़ल 💐 किसी के लिए दिल की धड़कन सी माँ है किसी के लिए एक उलझन सी माँ है !! पड़ी रहती है जो सड़क के किनारे वो दुनिया में कितनी अभागन सी माँ है जली खेत की धूप में, चूल्हे में फिर इक ऐसी भी जग में जलावन सी माँ है उसे तो कभी भी सँवरते न देखा वो विधवा सी है या सुहागन सी माँ है पतोहों को उसने कभी भी न समझा बड़ी आग घर में लगावन सी माँ है !! हमेशा वो रोती बिलखती है रहती वो सालों ही भर के तो सावन सी माँ है समेटे रही सारे संसार को जो वही अब तो ख़ुद ही विभाजन सी माँ है जहाँ में 'जेहद' इससे अच्छा न शासक ये सबसे ही अच्छे सुशासन सी माँ है !!        ~जावेद जहद

जान है तो जहान है..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐 जान है तो जहान है जाँ से ही जग में जान है एक ऐसा जहान है आँखें न उसको कान है जान हो न जहान में तो जहाँ फिर विरान है कैसे पाए बुलंदी जग पस्ती पर जब गुमान है हमसे नफ़रत करे जहाँ फिर भी अपनी तो मान है ऐब है जब सभी में तो सबकी ही झूठी शान है पहले था इक वुहान अब सारी दुनिया वुहान है !! मौला उनकी भी खोल दे बंद जिनकी दुकान है !! ज़ुल्म करते हैं ख़ूब जो अब तो उनकी ही मान है एक ऐसा है बादशाह जो बड़ा बेइमान है !! होता है किसका हक़ 'जेहद' मिलता ये किसको दान है !!      ~जावेद जहद

शायरी अच्छी वही होती है..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 शायरी अच्छी वही होती है जो समझ में सभी को आती है सर के ऊपर से गुज़र जाती है जो शायरी सर वो बड़ा खाती है !! जिसको मिलनी हो बस इक शेर से ही ख़ूब शोहरत उसे मिल जाती है !! कुछ तो बन जाती है आसानी से और कुछ शय बड़ा उलझाती है आपदा आती है तो दुनिया की सारी ही ख़ामी झलक जाती है पाप करते हैं कभी कुछ ही लोग पर दहर सारी सज़ा पाती है !! बेहया दुनिया हो जाती है जब तब ज़रा भी नहीं शर्माती है !! आ गई है ये दहर राह ग़लत देखिए अब ये किधर जाती है शख्सियत कितने ही लोगों की 'जहद' उनसे ही मेल नहीं खाती है !!       ~जावेद जहद

ये न उजड़े कभी दहर दिलकश..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐 ये न उजड़े कभी दहर दिलकश और भी हो ये ख़ुशनज़र दिलकश हर शहर, गाँव की मिरे मौला शाम रंगीं रहे, सहर दिलकश सारी दुनिया हसीं यूँ हो जाए आए सबको ही ये नज़र दिलकश इस जहाँ को बिगाड़ो मत यारो मानते हो इसे अगर दिलकश ! दिलनशीं हो गई मिरी दुनिया कर दिया तूने यूँ सेहर दिलकश जिसका इख़लाक़ अच्छा होता है अस्ल में है वही बशर दिलकश ! आपकी दिलकशी का क्या कहना तन-बदन, दिल-जिगर, नज़र दिलकश कितना दिल को सुकून देती है बुरी ख़बरों में इक ख़बर दिलकश कोई जितना भी हो हसीन मगर सबको अपना लगे शहर दिलकश हम बुरे इस क़दर हैं क्यों, जब हैं बह्र-ओ-बर, शम्स और क़मर दिलकश क्यों 'जहद' जाते हो जहन्नम में छोड़ के तुम ये रहगुज़र दिलकश        ~जावेद जहद

थिरकते रहते हैं हरदम मटकते रहते हैं..

    ताज़ा ग़ज़ल 💐 थिरकते रहते हैं हरदम, मटकते रहते हैं ये इतना आप सनम क्यों सनकते रहते हैं तुम्हारे अंग में क्य ऐसा है भरा जानाँ ये अंग क्यों तिरे इतने लचकते रहते हैं उलझ गया है कोई क्या हसीन ज़ुल्फ़ों में ये इतना आप इसे क्यों झटकते रहते हैं समझ में आती नहीं आपकी कोई हरकत हमेशा आप तो मुझको खटकते रहते हैं ! चमक बनावटी नग-मोती की है मिट जाती कि असली हीरे तो हरदम चमकते रहते हैं जिधर है जाना, उधर को नहीं पहुंचते जो तमाम उम्र. वो यूँ ही.भटकते रहते हैं !! बला की चीज़ हैं ये शेर भी सुनो.यारो दुरुस्त लाख हों फिर भी खटकते रहते हैं शराब हद से ज़्यादा जो पीते रहते हैं बहुत बुरे वो शराबी महकते रहते हैं न जाने कब मिरा भी शेर कोई चमकेगा किसी-किसी के तो कितने दमकते रहते हैं 'जेहद' बुलंदियों की फ़िक्र तुम किया न करो वहाँ पहुंच के भी कितने सरकते रहते हैं !!          ~जावेद जहद

जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 जो ख़्वाब आँखों में आकर हँसाया करते हैं कभी-कभी वही बेहद  रुलाया करते हैं !! है जिनपे फ़र्ज़ हमें हर तरह से ख़ुश रखना तरह-तरह से वही क्यूँ  सताया करते हैं ? जो रूठ जाएं उन्हें छोड़ो मत कभी यूँँ ही ख़फ़ा जो रहते है उनको मनाया करते हैं उठा दो ऐसी शपथ जिसका एहतिराम नहीं रखो वही जिसे सारे  निभाया करते हैं !! हम उनकी क़द्र करें कैसे दोस्तो बोलो जो अपना भार-वज़न ख़ुद गिराया करते हैं ये ज़ात-पात, फ़सादात, छल को मौत आए उन्हें भी आग लगे जो सिखाया करते हैं !! जो जानते नहीं, वो क्या दिखाएं बेचारे जो जानते हैं, हुनर वो दिखाया करते हैं ये बार-बार 'जेहद' मौक़ा उनको क्या देना निकम्मे हों जो उन्हें तो हटाया करते हैं !!        ~जावेद जहद

या ख़ुदा, कैसी ये बला आई..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐 या ख़ुदा, कैसी ये बला आई हर तरफ़ मौत बनके है छाई घिर गईं कैसे ये अँधेरों में सारी दुनिया की सारी रानाई हर तरफ़ दर्द-ओ-ग़म है, मातम है ढोल बजता कहीं न शहनाई !! क्या पता क्या ख़ता हुई हमसे कैसे जुर्मों की है सज़ा पाई !! अब हवा भी भली नहीं लगती कैसी पछिया रे कैसी पुरवाई चल रहा था बहुत दिनों से खेल शक्ति से शक्ति अब है टकराई ! हम वफ़ा ख़ुद ही उससे कर न सके क्या हुआ, वो हुआ जो हरजाई !! मैं तो उस्ताद ख़ुद को कहता नहीं लोग समझें तो क्या करूँ भाई !! आपदा है बहुत बड़ी ये 'जहद' मिलके इमदाद सब करो भाई         ~जावेद जहद

अब गो कोरोना, तू गो कोरोना..

         ताज़ा ग़ज़ल 💐 अब गो कोरोना, तू गो कोरोना मौत की नींद  जा सो  कोरोना मर-बिला जा तू ऐसे सब बोलें अब किसी और भी नो कोरोना अबके आके तो मार डाला हमें अब कभी ऐसा  न हो कोरोना ता-क़यामत तिरा पता न चले जा तू ऐसे  कहीं खो कोरोना सारे जग को  हिला दिया तूने कितनी घातक बला हो कोरोना इस मुसीबत में तू हमारे बीच बीज नफ़रत के न बो कोरोना इक ख़ुदाई क़हर या अपनी ख़ता कुछ तो बोलो रे क्या हो कोरोना हम तिरा नाम तक मिटा देंगे हमसे पंगा  लिया जो कोरोना रैलियाँ  ख़ूब की  'जहद' तूने अब तू ले इस क़दर ढो कोरोना       ~जावेद जहद

मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है..

     ताज़ा ग़ज़ल 💐 मेरी निगाह अब भी तिरी रहगुज़र में है यानी तू आज भी बसी मेरी नज़र में है छूकर इन्हें भी जैसे छू लेता हूँ मैं तुझे तेरा ही लम्स तो मिरे दीवार-ओ-दर में है तू ही बता कि बिन तिरे इन सब का क्या करूँ दिल में जो जुनूँ मिरे, सौदा जो सर में है !! तेरे बिना भी मैं तो मगन रहता हूँ सनम तुम सा ही लुत्फ़ ये तिरे ख़्याल-ए-सेहर में है हुस्न-ओ-जमाल की तिरे तारीफ़ क्या करूँ तू आसमां के इन हसीं शम्स-ओ-क़मर में है मेरी कला में कुछ तो बला का जमाल है और कुछ कमाल आपके हुस्न-ए-नज़र में है अम्न-ओ-अमान, प्यार-वफ़ा की क़दर करो ये शै बड़े ही क़ीमती लाल-ओ-गुहर में है !! कोई भी काम हो तो समझदारियों से हो होता बड़ा अनर्थ ज़रा सी कसर में है !! कहती है दुनिया मेरा हर इक शेर देख के ये तो 'जेहद' सुख़न के बड़े जादूगर में है        ~जावेद जहद

जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है..

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       ताज़ा ग़ज़ल जाने क्यों उसको मोहब्बत पे हँसी आती है और मुझे उसकी तो आदत पे हँसी आती है वो न मिलते हैं, न मिलने ही हमें देते हैं उनकी इस गंदी सियासत पे हँसी आती है शादमानी में कभी रोना बहुत आता है और कभी दर्द-मुसीबत पे हँसी आती है यूँ भी होता है कभी ज़िंदगी की राहों में रोना आता है न क़िस्मत पे हँसी आती है उससे हो जाती है थोड़ी सी कमाई उसकी इसलिए उसको तो मय्यत पे हँसी आती है तू तो सबकुछ ही बहुत उम्दा हसीं चाहे है ऐ मिरे दिल, तिरी हसरत पे हसीं आती है माहिर-ए-फ़न से भी लग़ज़िश कभी हो जाती है ये भी क़ुदरत है तो क़ुदरत पे हँसी आती है !! झूट का सपने में भी कुछ न बनाओ यारो झूट की सारी इमारत पे हँसी आती है !! जो मिले जुर्म, गुनाहों के 'जहद' बदले में ऐसी तो इज़्ज़त-ओ-शोहरत पे हँसी आती है           जावेेद जहद

मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ..

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        ताज़ा ग़ज़ल मुद्दत से मैं जो एक ग़ज़ल सोच रहा हूँ बनती नहीं वो उम्दा शकल सोच रहा हूँ वो जिससे निकलती हैं सदा आग की लपटें किस तर्ह खिला है वो कँवल सोच रहा हूँ !! हो जाए बरी जिससे जहाँ सारे दुखों से इक ऐसा ही मैं कोई अमल सोच रहा हूँ मुझ जैसा ज़माने में बशर कोई नहीं है क्या है कोई भी मेरा बदल सोच रहा हूँ कब सोती है जी चैन से ये आज की दुनिया कब नींद मे होता है ख़लल सोच रहा हूँ !! पहले तो तमन्नाओं में उलझा लिया ख़ूद को अब ज़िंदगी हो जाए सहल सोच रहा हूँ !! वो प्यार का इज़हार तो करते नहीं पहले कर दूंगा कभी मैं ही पहल सोच रहा हूँ ! दिल इश्क़ में बिगड़ा तो बिगड़ता ही रहा फिर कैसे कोई जाता है सँभल सोच रहा हूँ !! इक हद की बुलंदी लिए सोचा था 'जहद' कुछ अब उससे ज़रा आगे निकल सोच रहा हूँ !!                       जावेेद जहद सहसरामी