कोई भी जग में आती है बहार आहिस्ता आहिस्ता..

      ताज़ा ग़ज़ल 💐
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222  1222. 1222  1222

कोई भी जग में आती है बहार आहिस्ता आहिस्ता
किसी भी शै पे छाता है निखार आहिस्ता आहिस्ता

अचानक जो नशा चढ़ता उतरता भी अचानक है
जो जल्दी न चढ़े उतरे ख़ुमार आहिस्ता आहिस्ता

बहुत उलझी हैं ये ज़ुल्फ़ें गुज़िश्ता रात में शायद
बड़े ही प्यार से इनको सँवार आहिस्ता आहिस्ता 

झटक दे झटके से उसको कि जो भी सर पे है तेरे
या फिर उस बोझ को ले तू उतार आहिस्ता आहिस्ता

बहुत से हो चुके इस दौर में और अब जो हैं बाक़ी
कभी हो जाएंगे वो भी बिमार आहिस्ता आहिस्ता

मैं वो शायर नहीं जो आँधी जैसे आते-जाते हैं
कराया मैंने है ख़ुद को शुमार आहिस्ता आहिस्ता

ये रातों-रात शोहरत की 'जहद' सोचो न तुम बातें
सफ़लता मिलती है अक्सर अपार आहिस्ता आहिस्ता

       ~जावेद जहद

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