कुछ अपने बारे में...
मेरे पिता अब्दुल क़्यूम साहब मरहूम सरकारी मुलाज़मत से रिटायर हुए और लगभग 10-12 साल पहले अल्लाह को प्यारे हो गए.. वालदा मोहतरमा उनसे भी बहुत पहले चल बसी थीं.. तीन भाई, तीन बहनों में सबसे बड़ा मैं.. मंझले मोहम्मद शारिक (SBI मैनेजर, इलाहाबाद)..छोटे मोहम्मद दानिश ज़ेरे-तालिम..और तीनों बहनेंं अपनी-अपनी ससुराल.. माँ-बाप की तरह सभी भाई-बहन निहायत नेक, मिलनसार, इबादतगुज़ार, परहेज़गार.. एक मैं ही बेकार निकल गया बैठ के शायरी करता रहता हूँ 😊
अदब से लगाव बचपन से था..लिखने का शौक़ जागा अपने समय की बेहद मक़बूल उर्दू पत्रिका "शमा" के अध्ययन से.. उसे पढ़ते पढ़ते उसमें छपने की अपनी भी ख़्वाहिश होने लगी..लेकिन जब लिखने लगा तो पत्रिका ही बंद हो गई.. तमन्ना अधूरी रह गई.. एक और अधूरी तमन्ना अच्छे उस्ताद की शागिर्दी की आज तक पूरी न हो सकी..शुरूआत में कुछ ग़ज़लें कुछ उस्तादों को दिखाई लेकिन हद से ज़्यादा उनका दौड़ाना मुझे रास नहीं आया.. और मैंने ठान लिया कि इस क्षेत्र में अब मुझे जो भी करना है, ख़ुद से ही करना है ।
मेरी पहली रचना (कहानी-गुमनाम जज़्बे) उर्दू की मशहूर पत्रिका "बीसवीं सदी" में जून 2000 में जमशेद अख़्तर नाम से प्रकाशित हुई.. उसके बाद इसी नाम से कुछ और भी ग़ज़लें-कहानियां "शायर", "उर्दू चैनल", "पालिका समाचार", "फ़िल्मी दुनिया", "सरिता", "सरस सलिल", "गुलाबी किरन" वगैरह में छपती रहीं..
मीर, ग़ालिब को कौन पसंद नहीं करता.. इनके अलावा मुझे दाग़, फ़ैज़, फ़राज़, मोमिन, क़तील, जिगर, मख़दूम, शाद, सीमाब, कैफ़ी, जां निसार अख़्तर, शकील, साहिर, मजरूह, शहरयार, बेकल उतसाही, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, निदा फ़ाज़ली, बशीर बद्र, प्रवीन शाकिर, मुज़फ़्फ़र हंफ़ी, मुनव्वर राना, प्रेम चंद्र, कृष्ण चंद्र, मंटू, राजेंद्र सिंह बेदी वगैरह बेहद पसंद आए..इनकी रचनाएं मैं बहुत ध्यान से सीखने के ख़्याल से पढ़ा करता था..शायरी की तकनीक तो मैं पहले से ही काम भर जानता था..लेकिन सोशल मीडिया पर आने से इसमें और भी इज़ाफ़ा हुआ.. यहाँ मुझे लोगों का काफ़ी प्यार, सराहना और सुझाव मिला.. इसलिए कहा जासकता है कि मेरे बहुत सारे उस्ताद हैं.. सभी का तहेदिल से शुक्रिया !!
ये ब्लॉग, अपनी रचनाओं की किताबी शक्ल देने की बस एक छोटी सी कोशिश है.. आज़ाद रचनाओं से ज़्यादा मुझे पाबंद रचनाएं पसंद हैं...
इस समय मेरे तीन बच्चे हैं.. एक लड़का, दो लड़की..और एक छोटी सी फुटवेयर की दुकान.. मक़ामी कालेज, S.P Jain College से (Urdu Hons) करने के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी..जिसका मुझे बेहद अफ़सोस है.. पर जो होता है अच्छा ही होता है.. शुक्रिया 💐💐
करन सराय, सासाराम, बिहार
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