ऐ मिरी ज़िंदगी कुछ काम न आएगी क्या..

        ताज़ा ग़ज़ल 💐
बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122  1122  1122  22

ऐ मिरी ज़िंदगी कुछ काम न आएगी क्या
तू मिरे ख़्वाबों की ताबीर न लाएगी क्या

हर तरफ़ ख़ौफ़ है, ख़ूँरेज़ी है, मनमानी है
इन दिनों की हसीं अब शाम न आएगी क्या

इक ज़माने से तुझे मैंने सनम देखा नहीं
अब तड़प मेरी तुझे खींच न लाएगी क्या

दिल मचलता है मिरा फिर तिरी मयनोशी को
प्यार का फिर तू लिए जाम न आएगी क्या

हर तरफ़ रोज़ ही होने लगी है अपनी शिकस्त
अब फ़तह कोई मिरे नाम न आएगी क्या ?

हर शमा बुझ गई अच्छाइयों की क्या यारो
ज़ुलमतों से ये कभी अब नहीं टकराएगी क्या

क्या ज़माना है 'जहद' मिट गई है सारी वफ़ा
अब किसी के भी ये कुछ काम न आएगी क्या

        ~जावेद जहद

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