कितना हसीन-ओ-दिलकश ये देश है हमारा..
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221 2122 221 2122
कितना हसीन-ओ-दिलकश ये देश है हमारा
आए न गर्दिशों में इसका कभी सितारा ।।
जंगल पहाड़ सागर, क्या कुछ यहाँ नहीं है
क़ुदरत ने इसको जैसे फ़ुर्सत में है सँवारा
हिंदू हों सिख इसाई, या जाट या मराठा
हो जाता है यहाँ पर सबका ही तो गुज़ारा
लड़ जाते हैं कभी हम आपस में यूँ तो यारो
लेकिन बहुत है हम में सचमुच में भाईचारा
इतना है प्यार हमको इस सरज़मीं से यारो
इसके लिए हमें तो मरना भी है गवारा ।।
अशरफ़ बना के हमको भेजा है जब ख़ुदा ने
अब ख़ुद बनें बुरे तो है ये बड़ा ख़सारा ।।
हो जाए कोई ग़लती और उसका दिल में दुख हो
कोशिश रहे कि वैसा न हो कभी दुबारा ।।
दिल और दिमाग़ रौशन करके 'जहद' ये अपना
बन जाओ तुम भी कोई आकाश का सितारा ।
~जावेद जहद
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