दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश..
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दिल खींचती है जैसे कि गुलज़ार की कशिश
वैसी ही हूबहू है मिरे यार की कशिश !!
होती है उतनी ही तो वफ़ा-प्यार की कशिश
मद्धम की हो या चाहे ये बौछार की कशिश
जिसको पसंद आ गई घर-द्वार की कशिश
भाती नहीं है फिर उसे बाज़ार की कशिश
अब पूछिए न मुझमें कशिश कितनी है जनाब
ये दुनिया जानती है क़लमकार की कशिश !!
बनना है पुर-कशिश तो सभी अपनी ज़ात में
पैदा करो मोहब्बत-ओ-ईसार की कशिश !!
सारे जहाँ को उसने दिवाना बना लिया
देखो तो उस सियाने अदाकार की कशिश
होगी किसी को चाह किसी हूर की 'जेहद'
अपने लिए तो बस वही रुख़सार की कशिश
~जावेद जेहद
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