अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा..
ताज़ा ग़ज़ल 💐
अपनी तहज़ीब का अब चमन ना रहा
क्या कहें पहले सा वो वतन ना रहा ।।
अब शहर-गांव और ना किसी सम्त भी
सच तो ये है वफ़ा का चलन ना रहा ।।
हिंदू-मुस्लिम हों ईसाई या कोई भी
अब किसी में भी वो अपनापन ना रहा
दिल गुनहगार हैं, चेहरे मक्कार हैं
जिस्म पर भी वो अब पैरहन ना रहा
घर के बटवारे में दिल भी बट-बट गए
इसलिए ही तो हो अब मिलन ना रहा
कितने रंगों का मेला लगा है 'जहद'
हाँ मगर रंग-ए-गंग-ओ-जमन ना रहा
~जावेद जहद
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